बदनाम ही सही लेकिन गुमनाम नहीं हूं मैं: मंटो


आज के लेखकों के बीच यह माना जाता है कि साहित्य इतिहास में अमर होने के लिए उपन्यास लिखना बहुत जरूरी है. पर उसी इतिहास के बीच एक ऐसा भी नाम है जिसने अपनी कहानियों से इस बात को खारिज कर दिया. और वह नाम है, सआदत हसन मंटो.

मंटो की खूबी यही है कि वो जब तक जीवित थे तब तक तो अनेक कारणों से चर्चा में रहते ही थे, मृत्यु के कई दशकों के बाद भी वे कहानीकारों और किस्साकारों के बीच प्रासंगिक तौर पर चर्चा में रहते हैं. मंटो पर शायद यही लाइनें फिट बैठती हैं जो उन्होंने अपने करीबी दोस्त साहिर लुधियानवी से एक बार कहा था, ‘बदनाम ही सही लेकिन गुमनाम नहीं हूं मैं.’

मंटो का जन्म 11 मई 1912 को ब्रिटिश इंडिया के पंजाब प्रांत में हुआ था. वो मूलतः उर्दू के लेखक थे, उन्होंने बाइस लघु कथा संग्रह, रेडियो नाटक के पांच संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह और व्यक्तिगत रेखाचित्र के दो संग्रह प्रकाशित किए. मंटो की कहानियों की चर्चा बीते दशकों में जितनी हुई है उतनी चर्चा हिंदी और उर्दू के कहानीकारों की शायद ही हुई हो.

मंटो पर आरोप भी लगे. यहां तक कि कहानियों में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को छह बार अदालत भी जाना पड़ा था.

मंटो पर आरोप भी लगे. यहां तक कि कहानियों में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को छह बार अदालत भी जाना पड़ा था. जितनी विविधता और जितना संघर्ष मंटो की रचनाओं में दिखती है वही सब उनकी खुद की ज़िन्दगी में भी देखने को मिलता है. उनके पिता गुलाम हसन एक बैरिस्टर और जज थे. उनकी मां सरदार बेगम थीं. मंटो बचपन से ही शरारती थे. अमृतसर के मुस्लिम हाईस्कूल में ही उन्होंने अपने दो चार दोस्तों के साथ मिलकर एक नाटक मंडली बनाकर आगा हश्र के एक नाटक के मंचन की तैयारी शुरू कर दी. मंटो के वालिद को पता चलते ही उनके हारमोनियम और तबले तोड़े जा चुके थे.

मंटो के अन्दर रचनात्मकता प्राकृतिक थी. 1919 के जलियावाला बाग़ की घटना ने सात वर्ष के मंटो के दिल और दिमाग पर गहरा प्रभाव डाला था. बाद में मंटो नें ‘तमाशा’ नामक अपनी पहली कहानी में सात वर्ष के खालिद की मानसिक स्थिति के जरिए जलियावाला बाग की घटना को अंजाम देने वाली क्रूर ताकतों की बर्बरता को पेश किया. 1934 में 22 वर्ष की उम्र में मंटो नें अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया. उसके कुछ ही दिन बाद उनकी दूसरी कहानी ‘इन्किलाब पसंद’ प्रकाशित हुई.

राजनीति और समाज के अलावा मंटो ने अपनी कहानियों के जरिए धर्म और साहित्य की हकीकतों का पर्दाफाश भी किया. मंटो ने अपने आसपास की जिंदगी को अपने समय की सच्चाई को ना केवल देखा बल्कि उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करके उसे कहानियों के रूप में गढ़ा.

विभाजन और विभाजन से होने वाले दंगे का मंटो पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था. इसी कारण दंगो के दुष्प्रभाव का जितना मार्मिक चित्रण मंटो की कहानियों में मिलता है, उसे कहीं और ढूंढ पाना बहुत कठिन है.

आलोचक मोहम्मद हसन असगरी ने मंटो के लिए कहा है, ‘मंटो की दृष्टि में कोई भी मनुष्य मूल्यहीन नहीं था. वह हर मनुष्य के साथ इस आशा से मिलता था कि उसके अस्तित्व में जरुर कोई न कोई अर्थ छिपा होगा जो एक ना एक दिन प्रकट हो जाएगा.’

मंटो दोस्तों के हद दर्जे तक दोस्त थे (मंटो, मेरा दोस्त – मोहम्मद असदुल्लाह), और दुश्मनों के दुश्मन भी (मंटो मेरा दुश्मन – उपेन्द्र नाथ अश्क), अमृता प्रीतम के ‘रशीदी टिकट’ से लेकर कृष्णा शोबती के ‘हम हशमत’ तक. प्रख्यात उर्दू लेखिका इस्मत चुगताई और मंटो के दोस्ती के चर्चे पाकिस्तान से लेकर हिन्दुस्तान तक चर्चित थे. इन पर साथ-साथ मुकदमे चलते, कहानियों में अश्लीलता के आरोप लगते, कोर्ट में पेशियां भी साथ-साथ करते और साथ-साथ बरी भी होते.

उर्दू लेखक मुशर्रफ आलम जैकी कहते हैं कि दुनिया मंटो को अब समझ रही है. उन पर भारत और पाकिस्तान में शोध हो रहे हैं, किन्तु मंटो को पूरी तरह समझने के लिए सौ साल भी कम हैं. मंटो की कहानियां अपने अंत के साथ ख़त्म ही नहीं होती हैं बल्कि अपने पीछे झकझोर देने वाली सच्चाइयां छोड़ जाती हैं.

खुद को बड़ा लेखक या महान ज्ञाता साबित करने के लिए मंटो कभी कोई बहुत बड़ा और गूढ़ जवाब नहीं देते थे. बस यही कहते थे, ‘मैं अफसाना नहीं लिखता, अफसाना मुझे लिखता है! कभी-कभी हैरत होती है कि वो कौन लोग हैं जिन्होंने इतने अच्छे अफसाने लिखे हैं. मैं ऐसे लिखता हूं जैसे खाना खाता हूं, गुसल करता हूं, मैं तो कागज लेता हूं, अफसाना शुरू कर देता हूं, मेरी तीन बच्चियां शोर मचा रही हैं, मैं उनसे बात भी कर लेता हूं, कोई मिलने आता है तो खातिरदारी भी कर लेता हूं, और फिर भी अफसाना लिखे जाता हूं.”

मंटो ने अपने जीवन में अनेक संघर्षों को झेलते हुए, अश्लीलता के आरोपों में अदालतों के चक्कर लगाते हुए, बदकिस्मती को भोगते हुए सारा जीवन गुजार दिया. यह अजीब इत्तेफाक ही था कि जिस दिन मंटो ने लाहौर में अंतिम सांस ली, उस दिन उनकी लिखी फिल्म मिर्ज़ा ग़ालिब दिल्ली में हाउसफुल चल रही थी. मंटो की कहानियों पर अब तक कई फ़िल्में बन चुकी हैं. आज भी मंटो के प्रासंगिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके जीवन पर बनी एक चर्चित फिल्म आ रही है.

यह अजीब इत्तेफाक ही था कि जिस दिन मंटो ने लाहौर में अंतिम सांस ली, उस दिन उनकी लिखी फिल्म मिर्ज़ा ग़ालिब दिल्ली में हाउसफुल चल रही थी

मंटो ने अपने 19 साल के साहित्यिक जीवन में लगभग 230 कहानियां, 65 रेडियो नाटक, 22 शब्द चित्र और 70 लेखों की रचना की. सिर्फ 42 साल की उम्र में इस महान रचनाकार ने 18 जनवरी 1955 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. लेकिन आधी सदी से भी ज्यादा गुजरने के बाद भी उनकी प्रासंगिकता और लोकप्रियता बरकरार है.


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