आखिर इतनी देर से क्यों जागा सुप्रीम कोर्ट?


सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन रहे जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने बहुत पहले एक फैसला सुनाते हुए गालिब का एक शेर कहा था कि, मरते हैं आरजू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती!
दरअसल, काटजू एक ऐसे केस पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें याचिकाककर्ता ने इच्छामृत्यु की मांग की थी.

आज जब सुप्रीमकोर्ट के चारों जज, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा पर सिलसिलेवार आरोप लगा रहे थे तो मार्कंडेय काटजू द्वारा कहे गए गालिब के ये शब्द बहुत याद आ रहे थे.

ये महज संयोग ही है कि दो दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट अपने ही एक निर्णय से पलट गया, जिसमें देश के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया गया था. और ये अनिवार्य किया गया निर्णय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के ही दिमाग की उपज थी. यहां ये बात ध्यान रखनी है कि दीपक मिश्रा देश की उस व्यवस्था की अगुवाई कर रहे हैं, जिस पर भारत देश के लोग दुनिया की किसी भी चीज से ज्यादा भरोसा करते हैं.

12 जनवरी, स्वामी विवेकानंद की जयंती भारत युवा दिवस के रूप में मनाता है. वही दिन अब भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और चीज के लिए अंकित हो गया.

 

सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों, जस्टिस जे चेलामेश्वर, मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ और रंजन गोगोई द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में आकर सुप्रीम कोर्ट को बचाने की अपील करना कोई आम नहीं ऐतिहासिक घटना है.

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा खुलेआम मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ बोलना एक विद्रोह करने जैसा है. और इतिहास गवाह है कि विद्रोह तभी होता है जब चीजें निरंकुश हो जाएं, चाहे वो नकारात्मक रूप से हों या सकारात्मक रूप से हों. सुप्रीम कोर्ट में घटित हुईं पिछली कुछ घटनाओं और दीपक मिश्रा जिन पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं उनके पूरे करियर को देख कर ऐसा लग सकता है कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था में कुछ ना कुछ गड़बड़ है.

लेकिन सवाल यह है कि जिस वजह से सुप्रीम कोर्ट को बचाने की बात हो रही है , क्या उसकी वजह दीपक मिश्रा हैं? क्या उसकी वजह राष्ट्रीय न्यायिक आयोग है? क्या उसकी वजह हमेशा से सरकार ही है?
दूसरा सवाल यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट में गड़बड़ होने की ये वजहें नहीं हैं तो फिर असली कारण क्या है?

 

अप्रैल 2016 में जजों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर अपनी बात कहते-कहते सबके सामने रो पड़े थे. इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे.

जस्टिस टीएस ठाकुर ने उस समय न्यायपालिका पर काम के बोझ का दर्द बयां किया था और जोर देकर न्यायिक सुधार के लिए बात कही थी.
जस्टिस दीपक मिश्रा का मामला अब राजनैतिक रंग ले चुका है, और राजनैतिक रंग से रंगे जाने के बाद किसी भी चीज को सच्चाई से दूर रखने के लिए और किसी की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर भारतीय न्यायिक व्यवस्था सच्चाई से भागती रही तो उसे दीपक मिश्रा के कथित कार्यों और टीएस ठाकुर के रुदन जैसे कई उदाहरणों का सामना करना पड़ेगा.

दरअसल, न्यायपालिका काम के बोझ और भारतीय न्यायिक प्रक्रिया से खुद इतना तंग आ चुकी है कि समय-समय पर उसकी झलक देखने को मिलती रहती है, चाहे वो जजों के भ्रष्टाचार का मामला हो या जजों की आपसी कलह का मामला हो.
खुद सुप्रीम कोर्ट में करीब 60,000 मामले लंबित पड़े हैं. उच्च न्यायालयों में 45 लाख से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं. जिला न्यायालयों और ट्रायल कोर्ट्स में लंबित मामलों की तादाद 2.75 करोड़ से भी ऊपर है. कुल मिलाकर आज की तारीख में पूरे देश में तीन करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं.

 

एक ताजे उदाहरण से अगर समझा जाए इसे. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाले का केस 1996 में हुआ था. उस केस में 22 साल बाद रांची की CBI अदालत ने जनवरी 2018 में फैसला सुनाया. और अभी भी उस प्रक्रिया में दो चरण लालू यादव की तरफ से (हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प) बाकी है. यह एकमात्र उदाहरण है भारतीय न्यायिक प्रक्रिया का, वो भी हाई प्रोफाइल केस होने के चलते. वरना पीढियां गुजर जाती हैं, फैसला आने में.

दीपक मिश्रा का कार्यकाल अक्टूबर 2018 तक है. दीपक मिश्रा से पहले सुप्रीम कोर्ट के 44 मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं. दीपक मिश्रा के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश आएंगे, और डेढ़-दो साल बाद चले जाएंगे. लेकिन जो बात हमेशा रहेगी वह है देश की न्यायिक वयवस्था, और उस पर भारतीय जनता का भरोसा.

 

यह बात ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट के जज सामने आकर न्यायिक वयवस्था को बचाने की बात करते हैं. लेकिन यह बात भी गौर होनी चाहिए कि उसे बचाना किस चीज से है, उसमें सुधार की क्या जरूरत है? कुछ दिन बाद इन्हीं चारों जजों में से कोई सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनेगा. तो क्या आज की समस्या हल हो जाएगी? क्या तब तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित सारे केसों की सुनवाई हो जाएगी? क्या जिस कारण से जस्टिस टीएस ठाकुर रोए थे, वो समस्या हल हो जाएगी? क्या जिस वजह से एकमात्र केस की सुनवाई 30 सालों तक चलती है, वो वजह दूर हो जाएगी?

अगर ऐसा नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट और न्यायिक व्यवस्था के पैरोकारों को उन चीजों पर ध्यान देना उचित होगा जिसकी वजह से न्यायिक प्रणाली हमेशा रोती है!

 

खुद सुप्रीम कोर्ट में अभी न्यायाधीशों के 5 पद खाली पड़े हैं. आखिर किस चीज का इन्तजार किया जा रहा है, किस चीज के कारण इतने केसों की सुनवाई लंबित है. इन चारों जजों का सामने आना इन्हीं कारणों का एक परिणाम मात्र है और यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि दीपक मिश्रा इसी न्यायिक प्रणाली की एक देन मात्र भर हैं.

बार-बार यह कहना क्यों पड़ रहा है कि न्यायालय काम के बोझ के तले दबे पड़े है. क्यों गरीब परिवार की एक पीढ़ी न्याय की गुहार लगाते-लगाते दूसरी पीढ़ी में तब्दील हो जाती है. क्यों रेप और भ्रष्टाचार का दोषी माला पहन कर महंगी गाड़ियों में घूमता है.
दूसरे देशों से सीख-सीखकर हम संविधान के अनुसार चलने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अगर उन्हीं से सीखकर न्यायिक प्रणाली नहीं सुधार पाए तो ये यह इस देश का बहुत बड़ा दुर्भाग्य होगा, जहां आज भी न्याय और कानून को धर्म और ईश्वर से बढ़कर माना जाता है.


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