युद्ध अपरिहार्य न हो तो गांधी वक़्त की ज़रूरत हैं


30 जनवरी 1948. नाथू राम गोडसे की बंदूक से तीन गोलियां निकलीं और गांधी का काम, तमाम हो गया. अहिंसा का सबसे बड़ा पुजारी, हिंसा पर बलिदान हो गया. गांधी जीवन भर क्षमा-क्षमा की रट लगाए, गांधी के हत्यारे को क्षमा नहीं मिली. उसे फांसी पर चढ़ा दिया गया.

कोई गांधी से पूछता तो शायद गांधी कहते कि जाने दो, इन्हें नहीं पता कि इन्होंने क्या किया है. माफ कर दो. माफी नहीं मिली. 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल नाथू राम गोडसे को फांसी दे दी गई. गांधी पहली बार आहत तब हुए थे. फिर आहत होने का सिलसिला चलता रहा.

संसद के सामने बनी उनकी मूर्ति…..हर दिन अपने सिद्धांतों को स्वाहा होते देखते रही.

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छूकर भी नहीं गुजरी अहिंसा
हम अहिंसा की बात करते हैं, अहिंसा हमसे छूकर नहीं गुजरी नहीं है. सब खोखले दावे हैं. भीतर तक हिंसा भरी हुई है. महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी दोनों महापुरुषों के दर्शन का सार ही अहिंसा पर आधारित है. लेकिन उस अहिंसा से हमने कुछ नहीं सीखा, महात्मा गांधी से क्या सीखते. कुछ नहीं सीखे.
अपने आसपास नजर दौड़ाइए. कौन है गांधी को पसंद करने वाला. गांधी के आदर्शों पर अगर गांधी कुछ दिन और जी जाते तो वे भी न चल पाते.

हमारे पास इतिहास है, कहानियां हैं. लेकिन बात आज की हो ज्याादा बेहतर है. कांग्रेस जिन महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानती है, उसे भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) ने हथिया लिया है. समझ नहीं आता कि जवाहर लाल नेहरू को पानी पी-पीकर कोसने वाले किस मुंह से महात्मा गांधी पर महोत्सव करते हैं. जवाहर लाल नेहरू गांधी को कितने प्रिय थे, यह बताने की जरूरत नहीं हैं. जिन्हें गांधी पसंद करते थे, उन्हें बीजेपी हर अवनति के लिए दोषी ठहराती है. मसलन आतंकवाद, नक्सलवाद, विकास, तिब्बत. हर जगह.

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मेगा शो…पर ‘गांधी गो’
याद आया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बापू की 150वीं जयंती पर मेगा शो करने वाले हैं. पूरी दुनिया बापू को याद करेगी. रघुपति राघव राजा राम की धुन दिन भर टीवी चैनलों पर गूंजने वाली है. गांधी से ज्यादा पीएम मोदी और अमित शाह टीवी पर दिखने वाले हैं. दोनों बापू को याद करेंगे, लेकिन उनकी राह पर चलेंगे नहीं. अगर चल दिए तो कश्मीर से सुरक्षा बल हटेंगे. पूर्वोत्तर के राज्यों में सुरक्षाबलों की दी गई ताकतें कम की जाएंगी, सीमा पार पाकिस्तान कितना भी सीज फायर क्यों न तोड़े हम जवाब नहीं देंगे. हम सीमा के भीतर गोलियां आने देंगे…पत्थरबाजी की इजाजत देंगे. कश्मीरी नेताओं की हिरासत खत्म करेंगे. अमन के रास्ते पर चलेंगे.

गांधी अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी हैं. राष्ट्रीय मंचों पर हम गांधी को सबसे ज्यादा रखते हैं. दुनिया उन्हें अहिंसा का सबसे बड़ा पुजारी मानती है, लेकिन उनकी राहों पर हम चलते वक्त चूक जाते हैं.

याद कीजिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2019 के चुनावी भाषण. पाकिस्तान में एयरस्ट्राइक, लंदन में लाशों को उठा लेने वाले दिया गया बयान, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के भाषण, गृह मंत्री अमित शाह के उन्मादी भाषण, जिन्हें सुनकर गांधी भी लाठी उठा लें, वे सब गांधी को श्रद्धांजलि देंगे.

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अगर गांधी जिंदा होते

महात्मा गांधी, आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई भी नहीं करने देते. रोक लेते. गोरक्षकों के आतंक पर महात्मा गांधी चीख पड़ते. सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ जाते. जब मॉब लिंचिंग की जाती तो गांधी सरकार का जीना हराम कर देते. निकल पड़ते निहत्थों की फौज लेकर अहिंसा की अलख जगाने.

गांधी कब्र से भी रो रहे होंगे कि उनके देश में अफवाह में जान ले ली जा रही है. गोरक्षा के नाम पर इंसानों का कत्ल कर दिया जा रहा है. सरकार विरोधी हर आंदोलनों को कुचल दिया जा रहा है जैसे अंग्रेज कुचलते थे. बलात्कारियों के खिलाफ शिकायत पर पीड़िताओं को जेल में डाल दिया जाता है. पुलिस दमनकारी है. मोटर व्हीकल एक्ट के इंप्लिमेंटेशन के प्रयास में सिद्धार्थनगर में निरीह नागरिकों को बुरी तरह से पीट दिया जाता है. बस्ती में निर्दयता से स्थानीय जनता को हुमुक दिया जाता है.पटना में बाढ़ से प्रभावित जनता को कच्चा आलू, सड़े हुए चूरे के साथ बांट दिया जाता है. प्रशासन दांत निकालके मस्त रहता है. विदेश में हाउडी मोदी मनाया जाता है. मेगा इवेंट होता है. नर्मदा के पानी को मेनटेन करने के प्रयास में सैकड़ों गांव पानी में डूब जाते हैं.

खबर आती है कि सोनभद्र में नरसंहार होता है. आदिवासियों पर दिनदहाड़े दबंग गोली मार दी जाती है. दस लोगों की मौत हो जाती है. विपक्ष को उस जगह जाने से रोक दिया जाता है. मुख्यमंत्री ढीठ होकर कई दिनों बाद दौरा करने जाते हैं, कई आरोपी बाहर घूमते हैं….कुछ संदिग्ध जेल में होते हैं…परिजन चेक पाकर संतुष्ट हो जाते हैं.

कश्मीर शटडाउन से जूझ रहा होता है. मेहबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, फारुक अब्दुल्ला और गिलाने जैसे नेता नजरबंद रहते हैं…..कोई पत्थरबाजी की घटना सामने नहीं आती….गली गली में सिहापियों की तैनाती हुई है…स्कूल बंद हैं. मोबाइल फोन सेवाएं रोकी गई हैं, लैंडलाइन भी भगवान भरोसे चल रहा है. इंटरनेट का मालिक अल्लाह जाने…

इन सारे हालातों पर गांधी क्या कहते? मौन रहते, धरने पर बैठ जाते या नाराज हो जाते.

कितने जरूरी हैं गांधी?

दावे किए जाते हैं घाटी में सब कुछ ठीक है. गांधी से कहा जा रहा है, सब ठीक है. तुम्हारा रास्ता ठीक तो है, लेकिन अपनाने लायक नहीं है. अगर अपना लिया तो देश का एकजुट हो पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा. कश्मीर मुट्ठी के रेत की तरह खिसक जाएगा. पाकिस्तान काफी अंदर तक देश के भीतर घुसेगा. कश्मीर प्रांत ही पाकिस्तान का हिस्सा हो जाएगा. सेना पर पत्थरबाजी फिर शुरू हो जाएगी…एक और पुलवमा होगा. तबाही जारी रहेगी….

भारत में किसी की भी सरकार आए……गांधी को पूजना उसकी मजबूरी है, लेकिन उनके सिद्धातों को अपनाना नहीं. कोई अपना भी नहीं सकता. गांधी आदर्श स्थिति हैं. उन पर गर्व किया जा सकता है, उनकी राह पर चलकर तिब्बत वाला हश्र ही होना है.

हिंसा भी उतनी जरूरी है जितनी अहिंसा. भय पैदा करने की सीमा तक तो जरूर. हां, हिंसा अपनाकर हम पाकिस्तान बन जाएंगे. भारत के बगल में अगर भूटान और नेपाल जैसा पड़ोसी हो तो गांधी को आत्मसात करना जरूरी है, लेकिन अगर पाकिस्तान बगल में हो, तो गांधीगिरी कर बस तबाह हुआ जा सकता है….गांधी बहुत जरूरी हैं, अगर युद्ध अपरिहार्य न हो तो.
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