राफेल मिले, तकनीक नहीं… बड़े घाटे का सौदा है ये?


रक्षा क्षेत्र में भारत के आत्मनिर्भर होने का सुनहरा मौका था, अगर भारत सरकार फ्रांस के साथ राफेल विमान सौदे में तकनीक ट्रांसफर की शर्त रख पाती. यह शर्त न होने से न केवल भारत को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ बल्कि तकनीक ट्रांसफर न होने से भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मोर्चों पर भी खमियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

“हां, माना जाना चाहिए कि रक्षा सौदे कभी पारदर्शी नहीं रहे… लेकिन पहले कोई सरकार पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार मिटाने के मुद्दों पर चुनी भी कब गई थी?”

फ्रांस की कंपनी दासॉ निर्मित लड़ाकू जेट विमान राफेल का पहला बैच भारतीय वायु सेना के अंबाला एयरबेस पर बुधवार को लैंड हुआ तो भारतीय, खासकर हिंदी मीडिया ने इस तरह पेश किया जैसे इससे बड़ी ऐतिहासिक घटना हो ही नहीं सकती थी, जबकि यह राफेल डील पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा प्रस्तावित डील के मुकाबले बहुत बौनी लगती है.

सोशल मीडिया पर जोक चल रहे हैं कि ‘फ्रांस को भी राफेल के बारे में हिंदी मीडिया से बहुत कुछ पता चला’. खैर, चंद्रयान, एयरस्ट्राइक और घर वापसी जैसे एपिसोड्स में मीडिया का यह ‘चिकने घड़े’ जैसा रवैया देखने की आदत हो चुकी है.

राफेल की महानता की खबरों और घुटने टेक मीडिया के ‘दिलचस्प फैक्ट्स’ के बीच ये जानना ज़रूरी है कि सिर्फ राफेल विमान भारत पहुंचे हैं, इन्हें बनाने की तकनीक भारत के हाथ नहीं लगेगी. साल 2016 में भारत सरकार ने फ्रांस के साथ 36 राफेल विमानों के लिए करीब 59000 करोड़ रुपये की डील की थी, उसमें तकनीक ट्रांसफर का क्लॉज़ नहीं था. क्यों? रक्षा सौदे की गोपनीयता की दलील के चलते ऐसे कई जवाब आज तक नहीं दिए.

अलबत्ता, 2011, जब यूपीए सरकार में राफेल के लिए फ्रांस के साथ डील पर बात चल रही थी, तब उसमें तकनीक ट्रांसफर का क्लॉज़ शामिल था. तकनीक के ट्रांसफर का मतलब आखिर क्या होता है? क्यों इस क्लॉज़ के न होने से ये घाटे का सौदा साबित होता है? किस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बना रह सकता है?

तकनीक ट्रांसफर

फाइटर जेट की दुनिया में तकनीक बहुत महत्व रखती है. एविएशन के जानकारों के मुताबिक तकनीक ट्रांसफर के ज़रिये निर्माता कंपनी या देश खरीदार देश को मूल तकनीक मुहैया करवाता है, जिससे खरीदार देश अपने स्तर पर खुद ये जेट भविष्य में बना सकता है और साथ ही खरीदे गए जेट्स में अपनी ज़रूरत के हिसाब से आधुनिकीकरण या कुछ बदलाव कर सकता है.

तकनीक ट्रांसफर इसलिए ज़रूरी होता है क्योंकि फाइटर जेट में कौन सा देश किस तरह के सिस्टम या अपग्रेडेशन का इस्तेमाल करता है, यह उसका निजी मामला होता है. तकनीक हाथ में आने से देश अपने हिसाब से विमानों के फीचरों में बदलाव कर सकता है और यह गोपनीय रह सकता है. लेकिन तकनीक न मिलने से उस देश से ही ये बदलाव या अपग्रेडेशन करवाने होते हैं, जहां से विमान खरीदे जाते हैं.

क्यों नहीं मिली तकनीक?

मोदी सरकार ने 2016 में जो राफेल डील की, वह पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के प्रस्तावित सौदे से बहुत अलग थी. इसमें केवल 36 राफेल विमानों का सौदा किया गया जबकि यूपीए 126 विमानों के लिए सौदा करने की योजना बना रही थी. 126 विमानों के सौदे पर फ्रांस इन विमानों की तकनीक साझा कर सकता था. तकनीक ट्रांसफर के लिए बड़ी डील की जाती है यानी विमानों के हिसाब से 100 या दो सौ विमानों की खरीद पर यह संभव होता है.

राफेल सौदे में तकनीक

भारत ने फ्रांस की दासॉ से 36 राफेल विमानों का सौदा किया है, जिसमें तकनीक ट्रांसफर शामिल नहीं है. ऐसे में, भारत को जो विशेष या अतिरिक्त या मोडिफाइड फीचर विमानों में चाहिए थे, उसे दासॉ से ही करवाने पड़े. ऐसे 13 मोडिफिकेशन्स के लिए भारत ने कथित रूप से 1.3 अरब यूरो की अतिरिक्त कीमत भी अदा की, वहीं उसे विमानों को अपने मुताबिक बनवाने के लिए फ्रांस के साथ गोपनीय इनपुट्स साझा करने पड़े.

“जब आपके नारे, आपके आदर्श और आपके बयान… आपके व्यवहार में ज़ाहिर नहीं होते तो इसे राष्ट्रवाद कहना कहां तक उचित है?”

इसका मतलब ये हुआ कि सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी तकनीक ट्रांसफर का न होना संवेदनशील मुद्दा हो जाता है. अब इस मुद्दे से जुड़कर राफेल विमानों की कीमत कैसे प्रभावित हुई, ये भी देखिए.

इस कदर महंगे राफेल?

राफेल सौदे के बारे में जांच पड़ताल और खोजबीन पर आधारित द हिंदू के एन. राम की एक रिपोर्ट जनवरी 2019 में प्रकाशित हुई थी, जो बेहद चर्चित रही थी. इस रिपोर्ट में यूपीए सरकार में प्रस्तावित और एनडीए सरकार के समय में राफेल डील के तुलनात्मक अध्ययन में बताया गया था कि कैसे यूपीए की डील बहुत बेहतर और सस्ती होती और क्यों एनडीए की डील पर कई सवालों की गुंजाइश पैदा हुई.

एन. राम के विश्लेषण को संक्षेप में समझें तो 2007 में यूपीए 1 सरकार के समय में 126 राफेल विमानों के लिए 9 करोड़ यूरो की डील प्रस्तावित थी. 2011 में यह कीमत करीब 10 करोड़ यूरो की हो गई थी. इन 126 विमानों में 18 फ्लाइअवे विमान होते जबकि 108 फाइटर जेट भारत में एचएएल बनाती जो कि फ्रांस से तकनीक ट्रांसफर के बाद लाइसेंस के तहत बनते यानी मेड इन इंडिया.

एनडीए सरकार ने 2016 में 36 विमानों के लिए 9 करोड़ यूरो से ज़्यादा की डील की. इनमें कुल 36 विमान फ्लाईअवे हैं यानी भारत को न तकनीक मिलेगी और न ही मेड इन इंडिया राफेल की गुंजाइश रहेगी.

फालोऑन क्लॉज़ भी नहीं?

इस डील में एक कसर ये भी रही कि तकनीक ट्रांसफर के साथ ही फॉलोऑन क्लॉज़ भी नहीं रहा. यूपीए सरकार में जो राफेल डील प्रस्तावित थी, उसके मुताबिक 126 विमानों की डील के बाद फिर कभी फॉलोऑन के तहत अगर और 50 राफेल जेट की डील होती तो लगभग इसी डील की शर्तों और कीमतों पर होती. यह क्लॉज़ एनडीए सरकार की डील में नहीं रहा. इसका मतलब ये है कि इन 36 के बाद अगर भारत ने और राफेल खरीदने चाहे तो उसके लिए भारत को और ज़्यादा कीमत अदा करनी होगी.

श्रम की कीमत
द हिंदू के लेख में ये भी मुद्दा उठाया गया था कि भारत ने अपनी रक्षा ज़रूरतों के हिसाब से हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर संबंधी जो एडवांस मोडिफिकेशन फ्रांस में करवाए, वो महंगा पड़ा. भारत ने इन 13 मोडिफिकेशन्स के लिए 1.3 अरब यूरो फ्रांस को अदा किए. ये कीमत 36 राफेल के लिए अदा की गई, जबकि यूपीए की प्रस्तावित डील में क्लॉज़ था 126 विमानों के साथ ही ऐसी अतिरिक्त कीमत फॉलोऑन खरीदी पर भी लागू होती.

दूसरी तरफ, फ्रांस में निर्माण लागत वैसे भी भारत से ज़्यादा है. दासॉ में एक राफेल विमान की निर्माण की लागत भारत के HAL में एक राफेल की लागत से करीब 2.7 गुना ज़्यादा पड़ी क्योंकि भारत में लेबर कॉस्ट कम है. अगर तकनीक ट्रांसफर होता तो भारत को एक बहुत बड़ी रकम का फायदा ऐसे संभव होता.

HAL का दुखड़ा
रक्षा क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने दावा किया था कि तकनीक के ट्रांसफर का क्लॉज़ न होना HAL को बड़ा झटका था. जब HAL 25 टन के सुखाई विमान बना चुकी थी, तो राफेल के निर्माण में कहीं कोई दिक्कत का सवाल ही नहीं था. HAL ने कहा था कि मोदी सरकार ने न केवल वादे के मुताबिक 5000 करोड़ का निवेश कंपनी को नहीं दिलवाया बल्कि उल्टे कंपनी के डिविडेंड से पैसा छीन लिया.

साथ ही, HAL कर्मियों ने जनवरी 2019 में एक बयान में कहा था कि तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने HAL के लिए 73000 करोड़ रुपये के आदेश होने संबंधी संसद में भ्रामक जानकारी दी. HAL के पास टोटल ऑर्डर 1.28 लाख करोड़ रुपये के थे, जिनमें से सिर्फ 26570 करोड़ के ऑर्डर मोदी सरकार के समय के थे और बाकी के यूपीए सरकार के समय के ही थे.

महज़ नारा है ‘आत्मनिर्भर’!
तकनीक ट्रांसफर न होने से भारत को इस सौदे में आर्थिक, रणनीतिक, सुरक्षा, तकनीक जैसे कई मोर्चों पर घाटा ही हुआ, यह साफ हो जाता है. आखिर में यह भी समझने की बात है कि अगर भारत के पास यह तकनीक होती तो भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की शुरूआत कर सकता था, जिसकी ज़रूरत लंबे समय से बनी रही है. ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर’ भारत जैसे शब्द नारेबाज़ी से ज़्यादा हो सकते थे.

(भवेश दिलशाद ने यह लेख मूल रूप से न्यूज़18 के लिए लिखा था, यहां प्रस्तुत लेख मूल का विस्तृत एवं संशोधित रूप है.)

संदर्भ लिंक्स
1. द हिंदू में एन राम की विस्तृत रिपोर्ट

2. द वायर की रिपोर्ट

3. तकनीक जानकारों की चर्चा

4. HAL के दावे और विस्तृत बयान


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