भारत के लिए शांति तो पाकिस्तान के लिए परमाणु बम है प्राथमिकता


इतिहास सबक देता है, अगर हम लेना चाहें तो. अमेरिका और जापान ने एक सबक सबको दी है. अमरीकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन का जिक्र भले ही कम सुनने को मिलता हो, लेकिन ये शख्स हिटलर से कहीं ज्यादा क्रूर और निर्दयी रहा होगा.

6 अगस्त, 1945 को जब हिरोशिमा पर लिटिल बॉय गिराया गया गया तो युद्ध पिपासुओं का मन नहीं भरा. उनकी आंकाक्षा थी कि तबाही की जरूरत अभी और भी है. इसी की परिणति रही कि 9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर फैटमैन गिरा दिया गया. सब ध्वस्त हो चुका था. दृश्य महाभारत के कुरुक्षेत्र से कहीं ज्यादा भयावह.
दिनकर की कविता उस दौर के इतिहास को पढ़कर बरबस याद आती है-

चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग,
फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग।
वाजियों-गजों की लोथों में, गिर रहे मनुज के छिन्न अंग,
बह रहा चतुष्पद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग।

वीभत्स. भयावह. मानवता…..का मन कहीं डूब कर मर जाने का करे. इस हादसे में वे लोग सबसे ज्यादा मारे गए, जिनका कुछ भी दोष नहीं था. जनता उन्मादी नहीं होती, जनता को महज दो वक्त की रोटी चाहिए…..समानता का अवसर चाहिए….स्कूल चाहिए….सुरक्षा चाहिए…रोजगार चाहिए.
जनता सीमाओं पर शव नहीं देखना चाहती….

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जनता रक्त पिपासु नहीं है

ठीक इसी तरह जनता बिलकुल भी नहीं चाहती थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच 1947-48, 1965, 1971 और 1999 में युद्ध हों. लेकिन हो गए. बुरी तरह से हुए. दोनों तरफ के लोग मरे, जम्मू-कश्मीर की घाटी बलिदान की घाटी है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी केवल एक नेता थे जो वहां मरे. सैनिक तो आए दिन मरते हैं.
इन सारे युद्धों से दोनों देशों ने कुछ नहीं सीखा..भारत ने कदम आगे भी बढ़ाया तो पाकिस्तान अपनी चिर-परिचत छवि से बाहर नहीं निकल पाया. आतंकवाद कब पाकिस्तान की नियति बनी, खुद पाकिस्तान को भी नहीं मालूम.

अब गाहे बगाहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी हैरी एस ट्रूमैन जैसा होने की इच्छा जताते रहते हैं. इन्हें भी एक मानवता को बचाने के लिए दूसरी बनी बनाई सभ्याता को तबाह करने का ख्वाब आता-जाता रहता है.

आतंकवाद से उभरने की कोशिश तो करे पाकिस्तान

अगर पाकिस्तान में सक्रिय कुल आतंकवादी संगठनों की गिनती करें तो गिनती कम पड़ जाए. भारत और पाकिस्तान एक ही माटी के दो हिस्से हैं. एक हिस्सा लगाातर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, एक हिस्सा आतंकवाद और इस्लाम को पुनर्जीवित करने की तैयारी. पाकिस्तान के लिए इस्लाम से दो कदम आगे बढ़ना भी मुश्किल साबित हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के 74वें सत्र में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वच्छता, बुद्ध, गांधी, विश्व बंधुत्व, वैश्विक मित्रता की बात कर रहे थे, ठीक आधे घंटे बाद पाकिस्तान वहां कुछ और कर रहा था.

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इमरान खान का शुरुआती भाषण में इस्लामोफोबिया का जिक्र किया. मुस्लिमों के साथ होने वाले वैश्विक दुर्व्यवहार को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के सामने रखा. उन्होंने कहा कि लोग हिजाब को हथियार की तरह पेश कर रहे हैं. महिलाओं को कपड़े उतारने का हक है, लेकिन कपड़े पहनने का नहीं. ऐसा सिर्फ इस्लाम के प्रति पश्चिमी देशों के गलत नजरिए की वजह से है.

इमरान ने कश्मीर पर जो कुछ भी कहा, उसे मानवतावाद की चरम सीमा कहते हैं. अच्छी बात है कि उन्हें कश्मीरियों की जिंदगी की चिंता है, उन्हें भारतीय मुसलमानों की चिंता है, उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कथित अमानवीय रवैये से दिक्कत है, हिंदुत्व से दिक्कत है….लेकिन ये सारी दिक्कतें उनके सीमा के भीतर कहीं ज्यादा हिंसक और उग्र रूप में हैं.

बलूचिस्तान में भी इंसान ही रहते हैं

बलूचिस्तान और सिंध में भी आजाद लोग रहते हैं. पाक अधिकृत कश्मीर में भी आजाद लोग रहते हैं. आजाद लोगों की रिहाई पर सख्ती क्यों. कई बलूच नेता वैश्विक मंचों से गुहार लगा रहे हैं कि बलूचों पर अत्याचार किया जा रहा है, हजारों की संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया है, कइयों को मार दिया गया है. कई मारे जा रहे हैं. मारे जाते रहेंगे.

इमरान खान को तब जवाब देना चाहिए था जब दक्षिण और मध्य एशिया के मामलों के लिए अमरीका के विदेश मंत्रालय की राजदूत एलिस वेल्स ने पूछा कि इमरान ख़ान सिर्फ़ कश्मीर के मुसलमानों की चिंता क्यों करते है, चीन के मुसलमानों की चिंता क्यों नहीं है. चुप्पी गहरी थी. चीन और अमेरिका को पाकिस्तान ने दोस्त समझ लिया है. अमेरिका और चीन किसी के नहीं है. हो ही नहीं सकते हैं. चीन, पाकिस्तान को और कमजोर करेगा, अमेरिका ने तो पहले ही कमजोर कर दिया है. पाकिस्तान अमेरिका और चीन के बीच फंसे हुआ पेंडुलम है जिसकी नियति में लटकना लिखा है.

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यही रुख अगर भारत के प्रति पाकिस्तान रखने लग जाए और सीमा पार आतंक को रोके…तो शायद भारत भी दो कदम चलने लायक हो. अगर भारत, नेपाल में निवेश कर सकता है, बांग्लादेश में कर सकता है, भूटान में कर सकता है…श्रीलंका से संबंध बेहतर कर सकता है तो पाकिस्तान से क्यों नहीं.

क्या है अलग भारत और पाकिस्तान में

जम्मू-कश्मीर में होने वाली हर आतंकवादी घटना पाकिस्तान प्रायोजित नहीं, लेकिन ज्यादातर हैं. उन्हें पाकिस्तान को रोकना चाहिए..लेकिन पाकिस्तान धमकी पर उतर आता है. इमरान खान बार-बार रट लगा रहे हैं कि कश्मीर पर अगर भारत अपने रुख में तब्दीली नहीं लाता है तो पाकिस्तान परमाणु संपन्न देश है. अगर दो परमाणु संपन्न पड़ोसियों में विवाद होता है, तो इसका असर दुनियाभर में होगा.

जिस मंच पर विश्व शांत की बात की जाती हो, वहां परमाणु का जिक्र कर पाकिस्तान अपनी चिर परिचित छवि से बाहर नहीं निकल पाया.

लगेगी आग, मकां आएंगे कई जद में

वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना पाकिस्तान का नाम लेते हुए कहा कि आतंकवाद किसी एक देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की और मानवता की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और इसलिए ये ज़रूरी है कि पूरी दुनिया आतंक के ख़िलाफ़ एक जुट हो.

मोदी ने केवल 17 मिनट का एक छोटा सा भाषण दिया लेकिन इस दौरान उन्होंने कई मुद्दों को उठाया. मोदी ने आतंकवाद को दुनिया के खतरा बताया और कहा कि हमारी आवाज में आतंक के खिलाफ दुनिया को सतर्क करने की गंभीरता भी है और आक्रोश भी. मोदी ने कहा, ”हम उस देश के वासी हैं जिसने दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिया है. पूरी दुनिया को शांति का संदेश दिया है.”

भारत का यह संदेश बहुत जरूरी है पाकिस्तान के लिए. भारत में ऐसा नहीं है कि समस्याएं नहीं है, लेकिन जितनी हैं, उनसे हर दिन भारत लड़ रहा है. सामरिक प्रयास हो रहा है, जनता का भी, सरकार का भी. इतनी स्थिरता है कि आतंकवादी राष्ट्र के तौर पर भारत की पहचान नहीं है. भारत के किसी भी काम से किसी दूसरे देश की सीमाओं को मुश्किल नहीं हो रही है.

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अमन की बात सीज फायर के साथ?

सीज फायर का उल्लंघन पाकिस्तान की ओर से लगातार किया जाता है, जिसकी गवाही जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांव देते हैं. पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में कहा है कि वह कश्मीर में शांति चाहता है तो शांति की पहल पर अमल करना भी शुरू करे. संघर्ष विराम का उल्लंघन रोके….सीमावर्ती इलाकों में शांति बढ़ाए…सच में कश्मीर को चैन से रहने दे जिससे में कश्मीरी अपने भविष्य का फैसला कर सकें….बिना किसी बाहरी उकसावे के. पाकिस्तान उन्हें अपनी जागीर तो बिलकुल न समझे, जितना उसके पास है, उसे संभाल के रख ले तो बेहतर है.

धर्म साइड लाइन हो तो बने बात

भारत की पहचान एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर नहीं है……एक समृद्ध परंपरा और संस्कृति वाले देश की है. यह छवि आज नहीं गढ़ी गई है…यह तब गढ़ी गई थी जब पाकिस्तान पैदा नहीं हुआ था. बंटवारा हुआ…संस्कृतियों का भी बंटवारा हुआ. जितनी विरासत हिंदुस्तान के पास थी, उतनी ही पाकिस्तान के पास. भारत ने अपनी परंपराएं नहीं छोड़ी, सर्व धर्म समभाव की धारणा को अपनाया…पाकिस्तान बिलकुल उलट चला.

पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनने की बेताबी थी. अच्छी बात है, इस्लाम की शिक्षाएं बेहद अच्छी हैं, अनुकरणीय भी. लेकिन पाकिस्तान को इस्लाम में कम रुचि नजर आई…आतंक में ज्यादा. जिहाद में ज्यादा.

इस प्रयास में ऐसा जिहाद हुआ कि पाकिस्तान और तालिबान में अंतर कर पाना लगभग असंभव हो गया. हर सरकार इसी छवि के साथ झूलती नजर आई.

बाजार ही दोस्ती का ‘ट्रिक’ है

भारत बड़ा बाजार है. बाजार में हर किसी को अपना माल बेचना है. हर दुकानदार की फितरत होती है कि वह ग्राहकों के प्रति बड़ा कृतज्ञ रहता है. अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जापान, चीन, इजराइल, जर्मनी, खाड़ी के देश..हर किसी के लिए भारत बाजार है. यहां की कुर्सी पर बैठने वाला हर शख्स दूसरे देशों के सत्ताधीशों का अच्छा दोस्त होता है. चेहरे चाहे कितनी बार बदलें. भारत हर देश की मजबूरी है.

यही बाजार पाकिस्तान को भी बनना चाहिए….भूमिका हथियार खरीदने वाले ग्राहक तक ही सीमित न रहे.

अगर हम गौर करें तो पाकिस्तान के साथ भारत का रुख बंटवारे के बाद से एक जैसा रहा है. जब कांग्रेस की सरकार रही तब भी, जब गैर कांग्रेसियों की रही तब भी. मनमोहन सिंह भी पाकिस्तान के लिए उतने ही बुरे थे, जितने नरेंद्र मोदी. क्योंकि पाकिस्तान खुद से जूझ रहा है….सीमा पार से उसकी उम्मीदें गलत हैं. जो होनी चाहिए, उससे इतर पाकिस्तान सोच रहा है. हिंसा, खून और गोलीबारी से इतर की दुनिया बहुत सुंदर है.

नेपाल, इंडोनेशिया और भूटान की तरह.

हर किसी का अच्छा संबंध रखना भारत की आदत है…अगर पाकिस्तान की ओर से शांति की पहल हो तो भारत में कितनी भी राष्ट्रवादी सरकार क्यों न हो…गोलियां तो नहीं बरसाएगी.

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