Sushant case

सुशांत और हाथरस केस: जांच में देरी से मीडिया को मिल जाते हैं ये मौके


पिछले कुछ महीनों में मीडिया रूपी गिद्ध को दो मामले मिले. इन दो मामलों ने मीडिया को टीआरपी रूपी संजीवनी दी. सिर्फ किम जोंग और हॉट तस्वीरों पर चल रहे मीडिया को तापने भर की आग मिल गई. बिहार चुनाव को ध्यान में रखते हुए नेताओं ने भी इस आग में और घी डाला. हालांकि, इस सबमें जांच एजेंसियों के काम करने के तरीके, पॉलिटिकल प्रेशर, एकतरफा रिपोर्टिंग और बेवजह पैदा की जाने वाले सनसनी ने खूब मसाला पैदा किया.

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परेशान करता है मीडिया ट्रायल

ऐसे संवेदनशील मामलों में जज बनने का बहुत शौक होता है. वह खुद ही दोषी तय करता है. जबरदस्त ट्रायल होता है. आरोपी को सिर्फ दोषी ही नहीं बल्कि उससे आगे भी कुछ साबित किया जाता है. हो सकता है कि जो आरोपी हो, आगे चलकर वही दोषी भी साबित हो. लेकिन मीडिया को इस बात का अधिकार नहीं है कि वह किसी को दोषी सिद्ध करे. बेशर्मी तो यह है कि ऐसे किसी आरोपी को, जिसे मीडिया विलन बनाता है, उसके दोषमुक्त होने पर मीडिया कभी भी माफी नहीं मांगता. वह बड़ी बेहयाई से किनारे हो जाता है.

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जज बनने लगे ऐंकर

अगर सुशांत की मौत के केस की बात करें तो इसने मीडिया को सबकुछ कर जरने का मौका दिया. आरोपियों के घर के बाहर मीडिया जम गया. कैमरे लोगों का पीछा करने लगे. कई लोगों ने आगे जाकर एकदम सीना ठोंककर दावा किया कि यह आत्महत्या नहीं हत्या ही है. न जाने कहां से आ गई वॉट्सऐप चैट्स ने अच्छे-अच्छों की पगड़ी उछाल दी. अब दूसरा मामला आया तो यही मीडिया तुरंत उसपर झपट गए और उसके हिसाब से तय किए सारे दोषियों का मामला ठंडा पड़ गया.

रिया चक्रवर्ती का जमकर हुआ चरित्र हनन

सुशांत केस में टीवी मीडिया ने रिया चक्रवर्ती को नागिन, पापिन, चुड़ैल, काला साया करने वाले जैसे कुख्यात तमगों से नवाज दिया. रिया के इंटरव्यू पर इस तरह के रिऐक्शन आए, जैसे किसी आतंकवादी का इंटरव्यू हो. सामान्य इंसान भी रिया को हत्यारन मानने लगी और इस बीच यह साबित किया जाने लगा कि रिया और उन जैसी तमाम लड़कियां लड़कों को फंसा लेती हैं. उनके पैसों पर ऐश करती हैं. मौका आने पर उनकी जान भी ले लेती हैं. बाद में हाई कोर्ट और सीबीआई ने माना कि यह मामला हत्या का नहीं है और इसमें रिया का हाथ नहीं है. कोर्ट के फैसले के बाद मीडिया चैनल चुप्पे से हाथ झाड़कर निकल गए.

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मौत के बाद ही क्यों जागते हैं लोग?

अब बात हाथरस की, इस केस में कमोबेश यही हुआ. रेप और हत्या का केस होने के बावजूद मीडिया को भनक ही तब लगी, जब पीड़िता की मौत हो गई. मीडिया को इसमें टीआरपी दिखी और सब कूद पड़े. एक वर्ग ने आरोपियों को तुरंत दोषी साबित कर दिया. दूसरे वर्ग ने लड़की के मां-बाप को ही दोषी मान लिया. प्रशासन और शासन की लापरवाही को लोग अपनी सुविधा के हिसाब से डिफेंड और अटैक करने लगे।

कौन है जिम्मेदार?

अब सवाल यह है कि आखिर यह सब होता क्यों है? क्यों मीडिया को ऐसे मामलों में चरित्र हनन का मौका मिल जाता है? ऐसे केस में सबसे बड़ा कारण प्रशासन का रवैया और जांच की स्पीड होती है. महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार हो, या यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार, प्रशासन के तौर पर दोनों ही जगह ढिलाई हुई. हर जगह लीपापोती की कोशिश हुई. मीडिया को यहीं मौका मिल गया. मीडिया ने जांच एजेंसियों और सरकारों पर सवाल उठाने के बजाय, आरोपियों और मृतक का ही चरित्र हनन शुरू कर दिया. रोज जांच एजेंसियां बदलती रहीं लेकिन कुछ सही नतीजा नहीं निकलता दिखा. इसका फायदा उठाकर मीडिया ने कहानियां बांचनी शुरू कर दीं.

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लाचार हैं एजेंसियां

यह सब दिखाता है कि एजेंसियां कितनी लाचार हैं और सरकारें कितनी बेशर्म. मीडिया इन सबमें कैटलिस्ट का काम करता है. वह अपनी टीआरपी के हिसाब से
सरकारों का पक्ष लेता है. एजेंसी को कटघरे में खड़ा करने के बजाय वह आरोपी और पीड़ित का ही चरित्र चित्रण करने लगता है और न्याय की उम्मीद में बैठी जनता आसानी से ठग ली जाती है.


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