शहीद-ए-आज़म! हम भारतीय, बकवासी हैं।


भगत सिंह। नाम एक वाद अनेक। उन्हें राष्ट्रवादी भी उतना ही सगा मानते हैं जितना कि वामपंथी। पंथ का ज़िक्र इसलिए किया कि बिना इसके आजकल हमारे देश में डकार भी नहीं लिया जाता।

आजकल तो पंथ की दौड़ सरपट चल ही रही है। अगर आप किसी पंथ के नहीं हैं तो आप बौद्धिक रूप से अपंग हैं। वाद-विवाद जैसी किसी संस्था का अस्तित्व ग़ायब है। सोशल मीडिया पर जो बहस चल रही है उसे देख भावुक मत होइए, आपकी नज़रों का धोखा है। मुद्दा किसी के पास नहीं है जो सामने दिख रहा है उसे कचरा कहते हैं।

हम-आप सब वही बीन रहे हैं। हमारे हाथों पर अलग अलग रंग के दस्ताने लगे हुए हैं जिसे जो वाला कूड़ा अच्छा लग रहा है वह वही उठा ले रहा है।

किसी मुद्दे को किसी भी हद तक भुनाया जा सकता है। नमक-मिर्च-लहसुन लगा कर, स्वादानुसार।

पिछले दिनों बीएचयू की छात्राओं पर लाठी चली। वीसी मीडिया में विश्वविद्यालय प्रशासन का बचाव करने आए। मीडिया के सामने ऐसे-ऐसे तर्क रखे कि उनके अध्यापक होने पर भी लोग सवाल खड़ा करने लगे। जवाब देते वक़्त वे पार्टी प्रवक्ता ज़्यादा लग रहे थे और वीसी कम। वीसी साहब अवसर वाद में यक़ीन रखते हैं, इसलिए वे ग़लत सही तय नहीं कर पा रहे हैं।

एक-दो दिन पहले एक और दुर्घटना हुई। उसके बारे में विस्तार से नहीं लिख सकता। किसी से बिना पूछे उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में लिखना ठीक नहीं है। लेकिन इसे सतसैया के दोहरे जैसा समझिए।

एक  वामपंथी पत्रकार हैं। एक वामपंथी मीडिया संस्थान में काम करते हैं। महिला उत्पीड़न, जातिप्रथा, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में उन्हें बहुत चिंता रहती है। पितृसत्ता पर बहुत खुल कर बोलते हैं। लाठी चार्ज पर बहुत संवेदनशील रिपोर्टिंग किए। ख़बर यह है कि उनकी वजह से एक लड़की हॉस्पिटल पहुंच गई। लड़की का फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल तलाशा तो पता लगा कि महाशय उसे कई महिनों से धोखा दे रहे हैं। दिल्ली शादी का वादा करके बुलाते हैं और फिर घर, जाति और समाज के किस्से सुनाते हैं। कहते हैं कि घर से कैसे बग़ावत कर लूं। घर वाले नहीं मानेंगे। लड़की की सहेली को भी लाइन मारते हैं साहब। लड़कियों के शिकार पर अक्सर निकल पड़ते हैं। सब के इनबॉक्स में साहब के संदेश होते हैं

घर पर किसी सजातीय सरकारी लड़की वाली से शादी की बात भी फ़िक्स है। लड़की के दोस्तों से स्टेटस हटाने को कह रहे हैं। लड़की ने उन्हें फ़ेसबुक पर तरीक़े से धोया है। लड़की अभी हॉस्पिटल में है और ख़तरे से बाहर है।

इन बातों का भगत सिंह से कोई कनेक्शन नहीं है। ऐसे ही फ़ेसबुक पर छिड़ी किसी बहस का किसी से कोई कनेक्शन नहीं होता। लाइक शेयर की दुनिया का एक ही दस्तूर है कि लड़े जाओ। हर मुद्दे पर खुल कर सबके सामने आओ। नहीं, स्वाभाविक स्वरूप में नहीं, बिलकुल बदलकर। दोगलेपन की मस्त सी चादर ओढ़ कर।

नवरात्रि चल रही है। देवी मां की भक्ति चल रही है। महिषासुर की भी। सुर देवी मां को पूज रहे हैं, असुर महिषासुर को। लोगों के पास अपने-अपने आराध्य को भजने के लाखों तर्क हैं। किसकी सही मानें।
ख़ैर जिसका जो मन करे उसकी पूजा कर ले। कौन रोकता है। जिसकी जैसी आस्था।

भगत सिंह की आस्था क्रांति में थी। कर के निकल गए। उनके नाम पर रोटी सेंके जाने का काम चलता रहेगा। वामपंथी इंकलाब ज़िंदाबाद करेंगे, दक्षिणपंथी जय भारत माता की जय करेंगे। भगत सिंह बेचारे विभाजन की मार झेल रहे हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा मेरी विचाराधारा क्या रही होगी?  ख़ैर इस तरह की परिस्थितियों से हर विचारक को जूझना पड़ता है, धरती से जाने के बाद। शहीद भगत सिंह भी अपवाद कहां से बनते?

विचारधाराएं स्वाभाविकत: परिस्थितिजन्य होती हैं। जब, जहां, जैसी परिस्थितियां बनीं उस विचारधारा को मान लिया, विचारधारा के सतत बने रहने से बड़ा घाटा होता है।

जाने कब तक लोगों की समझ में आएगा। ख़ैर अपना काम तो हो गया। चलिए….मिलते हैं…तबतक के लिए….जय श्री राम..वंदेमातरम…जय हिंद…लाल सलाम..और जो भी कहा जाता हो सब….।।

 


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