पुलिसवालों को ‘ठंडा’ रहने की ट्रेनिंग मिलनी बहुत जरूरी है


पुलिस- एक ऐसी संस्था जिसे किसी भी देश के कानून का लागू करवाने के लिए बनाया जाता है। लगभग सभी देशों, राज्यों और शहरों में यह संस्था होती है। कहा जाता है कि विदेशों में पुलिस भारत की पुलिस से अच्छी है। अब ये तो कहने वाले जानें कि कैसे अच्छी है, कैसे नहीं। हम यहां भारत में काम करने वाली उस पुलिस की बात करते हैं, जिससे हमारा रोजाना आमना-सामना होता है।

बेशक हर पुलिसवाला या यह संस्था खराब नहीं है। हालांकि, सब जानते हैं दाग कभी अच्छे नहीं होते। ‘खाकी पर दाग’ और ‘खाकी फिर हुई शर्मसार’ जैसी हेडिंग जब अखबारों में दिखती है और ऐसी खबरें सामने आती हैं तो ना चाहते हुए यह व्यवस्था सवालों के घेरे में आ ही जाती है। ऐसे में यह सोचना जरूरी हो जाता है कि समाज के इन रक्षकों को ‘भक्षक’ बनने से कैसे रोका जाए? ऐसा क्या किया जाए कि लोग पुलिस पर भरोसा कर सकें और उनसे डरने की बजाय उनको अपना दोस्त समझ सकें।

सबसे पहली जो जरूरी चीज है, वह है होमगार्ड से लेकर पुलिस के आला अधिकारियों को व्यवहार की ट्रेनिंग। दूसरी जरूरी चीज है कि रोजाना आम जनता से रूबरू होने वाले कॉन्स्टेबल, सिपाही और दरोगा को कानून ठीक से पढ़ाया जाए और उनको उनकी हद बताई जाएगी। यहां हद का मतलब यह है कि उन्हें स्पष्ट रूप से पता हो कि उन्हें किस काम के लिए लोगों से क्या बात करनी है।

खासकर थाने में बैठे सिपाहियों, चौराहे पर खड़े सिपाहियों, किसी मामले की जांच करने कॉलोनी या गांवों में जाने वाले पुलिसकर्मियों को यह जरूर सिखाया जाए कि उन्हें लोगों से हिटलर की तरह बात नहीं करनी है। उन्हें अंग्रेजो की फौज बनकर भारतीयों का दमन नहीं करना बल्कि उनकी मदद करनी है। खैर, पुलिस ही यह महकमा नहीं है, जिसे इस तरह का व्यवहार सिखाने की जरूरत है बल्कि सरकारी दफ्तरों में बैठे सभी कर्मचारियों को यह सिखाया जाए कि किसी से बात कैसे करनी है। पुलिस को भी खासकर प्राइवेट कंपनियों के काउंटर पर नकली हंसी ओढ़े बैठे कस्टमर केयर एग्जीक्यूटिव्स से सीखना चाहिए कि भले ही सामने वाला उखड़ रहा हो लेकिन आपको अपना टेंपर लो ही रखना है।


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