विश्व टेलिविजन दिवस: बचपन में टीवी देखने किसके यहां जाते थे?


अब के बच्चों के लिए टीवी पर दर्जनों कहानियां हैं. इतनी कि वो जिन्हें चाहें देख-सुन सकते हैं, छोड़ सकते हैं और कोई पसंद न आए तो अपने मिजाज से पैकेज ले सकते हैं लेकिन उनके पास शायद ही टीवी की अपनी कोई कहानी हो, वो कहानी जिसमें टीवी महज एक सूचना और मनोरंजन का माध्यम नहीं, उसके घर तक आने और आकर सरोगेट पेरेन्ट्स या सिबलिंग हो जाने तक की घटना शामिल हो. अब तो बच्चों के आने से पहले ही उनके घर में टीवी आ जाया करते हैं या पहले से हुआ करते हैं. वो टीवी के सामने ही आंखें खोलते हैं. हमारे साथ ऐसा नहीं था. हमने अपनी आंखों के सामने टीवी आते देखा, उस अनुभव को जिया है.

हमारा छुटपन जिस परिवेश से होकर गुजरा, उसमें टीवी खरीदने की हैसियत लगभग सबों के पास थी. वो जब चाहते, एक क्या, दो-तीन टीवी खरीद सकते थे. लेकिन कईयों ने खरीदा. मेरे ही घर में बहुत बाद में टीवी आया. ये वो दौर था जिसमें किसी चीज के खरीदने के पीछे सिर्फ पर्चेजिंग पावर का मसला काम नहीं करता. एक ही साथ कई सारी चीजें जुड़ जाती. मसलन, ये जरूरत है या लग्जरी ? जिस चीज से काम चल जा रहा हो, उस पर पैसे उड़ाने की क्या जरूरत? कहीं इसे खरीदने से टोला-पड़ोस को ये तो नहीं लग रहा कि शो ऑफ कर रहे हैं ? कहीं लोगों को ये तो नहीं लगेगा कि घर में दो नंबर का पैसा आने लगा है ? टीवी खरीदने से पहले घर-परिवार के लोग इस पर इन सारे एंगिल से विचार करते. लेकिन इसके साथ दूसरी बड़ी दिलचस्प बात थी- टीवी देखने की सामाजिकता.

मुझे याद है कि हमलोग शुरू के तीन-चार साल तक मोहल्ले भर के लोग एक ही घर में टीवी देखने जाते और वो भी सिर्फ रामायण. मोहल्ले का जो भी बच्चा रविवार साढ़े आठ बजे अगर सीरियस होकर जा रहा है तो इसका मतलब है कि वो रामायण देखने जा रहा है. कोई उस बच्चे से पूछ तो दे कि टीवी देखने जा रहे हो, वो लगभग भड़क जाने के अंदाज में कहता- नहीं, रामायण देखने जा रहे हैं. वो टीवी के बदले रामायण पर जोर देता. बाद में रामायण देखने का ये सिलसिला एक्सटेंड होता चला गया और टीपू सुल्तान-गालिब तक चलता. एक वक्त ऐसा भी आया कि हमलोग शुक्रवार और रविवार दूरदर्शन पर प्रसारित फिल्में भी देखने जाने लग गए.

उस घर के लोगों को इस बात का बड़ा इंतजार रहता कि मोहल्ले के लोग टीवी देखने आएंगे. कई बार मैं जाता और मेरी मां नहीं जा पाती. किसी कारण से तो एकदम से उस घर की भाभी-चाची पूछ बैठती- मम्मी नहीं आयी हैं, क्यों नहीं बोले आने, क्या हुआ है? जिसके घर टीवी देखने लोग जाते, माना जाता कि उनका मोहल्ले में बड़ा सम्मान है, रूतबा है. उस घर के बच्चे से हमारी लड़ाई हो जाती तो उल्टा हम धमकाते-अब तुम्हारे यहां संडे को टीवी देखने नहीं आएंगे. इस बात से वो उदास हो जाता और बेचारा या बेचारी उदास होकर कहती-सॉरी, अब लड़ाई नहीं करेंगे, अब तो आओगे न. बदलते वक्त के साथ टीवी की इस सामाजिकता को सहज उपलब्धता और सैकड़ों चैनलों के बीच हमने खो दिया.

उसी बीच अचानक से किसी घर के सारे बच्चे और बड़े आना बंद कर देते. खोजबीन होती तो पता चलता कि उनके घर टीवी आ गया है. हम आपस में लोग जानकर उदास हो जाते. उस घर के लोग तो और भी ज्यादा जिनके यहां हर संडे, फ्राइडे जमघट लगती. इस तरह एक और ने टीवी खरीद लिया तो देखनेवाले भी लोग बंटते चले गए. थोड़े वहां तो थोड़े दूसरे के यहां. फिर एक समय बाद उन्होंने भी टीवी खरीद लिया. फिर तीसरे ने, ऐसे में जो घर गुलजार रहता, वहां लोगों को जाना एकदम से घट गया. टीवी के जरिए बनती सामाजिकता टूटने लगी. तभी एक और जोर शुरू हुआ.

केबल नेटवर्क का चलन होने से फिर से रंगीन टीवी और बड़े हॉलवाला वो पुराना घर गुलजार हो गया. दूरदर्शन पीछे चला गया. इतना पीछे कि लोगों ने चित्रहार, रंगोली की चिंता छोड़ दी. डीडी टू के कार्यक्रम देखने लगे, जी टीवी पर आ गए और सबसे ज्यादा एक रात में तीन फिल्मोंवाला दौर.

मोहल्ले में लखैरा, लंपट, चाल-चलन का ढीला कहा जानेवाला लौंडा अपनी साफ-सुथरी छवि बनाने और लोगों को इम्प्रेस करने के चक्कर में किराये पर वीसीआर ले आता और अपनी मां और बहनों पर दबाव बनाता कि सबको कहो कि आकर देखें. मां-बहनें ऐसा करती भी. वो लौंडा सती अनुसुईया या शिव महिमा से शुरू करता और बलमा, लाडला, कयामत से कयामत तक जाता. आखिर में जब सब लटपटाने लग जाते तो उड़ती-उड़ती फीडबैक पाकर निहाल हो जाता- वैसे तो विपिनवा उपजल( पैदा होते ही) हरामी है, एक नंबर खचड़ा, बाकी बढ़िया-बढ़िया फिलिम लाया, एकदम पारिवारिक. उसी में पीछे से ममता मेरी मां से बोल पड़ती- चाची, आपको कयामत से कयामत तक फिल्म किस एंगिल से पारिवारिक लगा. मेरी मां तब पलटकर जबाव देती- अब सिनेमा तो सिनेमा ही रहेगा न, थोड़ा तो चुम्मा-चाटी रहेगी ही. अब तुम सिनेमा को चाहोगी कि सबसे सब हनुमान चालीसा हो जाए तो फिर पब्लिक तब पूजा-पाठ ही करे, फिलिम देखे के क्या जरूरत है?

लेकिन टीवी से बनती ये सामाजिकता ज्यादा दिन चली नहीं. घरों के ड्राइंगरूम तेजी से बदले, अपना परिवार, फोकस्ड एप्रोच, रिजर्व्ड एटीट्यूड और वो कस्बाई अंदाज तेजी से खत्म होने शुरू हुए. किसी के घर जाकर टीवी देखना सामाजिकता का नहीं, हीन या कमतर होने का मामला बनता चला गया. नतीजा कई घरों में आनन-फानन और तैश में आकर टीवी खरीदे गए. मेरे घर में तो घर के आधा से ज्यादा लोग दूसरे शहर में शिफ्ट हो गए और अकेली मेरी मां और छोटी दीदी रह गयी तो दिन काटने के लिए..घर छोड़कर किसी और के यहां जाकर देखना संभव ही नहीं था. और इन सबके बीच सबसे बड़ी बात कि अब टीवी हैसियत और जरूरत के बीच झूलने लग गया था. जिसके घर टीवी नहीं है वो ऐंवे टाइप की फैमिली है जैसा मामला बनने लग गया.

अब जब मैं फ्लाइट से जैसे-जैसे नीचे उतरता हूं और छतों पर निगाहें डालता हूं तो लगता है डिश टीवी की छतरियां लगायी नहीं बल्कि इसके बीच उसी तरह की फ्लाइट से छिड़क दिए गए हैं और वो सबके सब उग आए हैं. ट्रेन से गुजरना होता है तो अचानक जिन झुग्गियों पर नजर जाती है तो पुआल, टिन, एस्बेस्टस की छतों के कोने में डिश छतरी लगी होती हैं. टीवी अब हैसियत का नहीं, देखते-देखते रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा हो गया और इस बात का प्रतीक भी कि टीवी के जरिए हम हमारे बीच टीवी की सामाजिकता जैसी चीज कोई बची नहीं. अब तो मेरे जैसे इस देश में लाखों लोग हैं जिनके यहां एक ही दर्शक है. यानी परमुंडी एक टीवी. एक ही तकनीक, एक ही माध्यम और एक ही यंत्र ने कैसे समाज को अलग-अलग दौर में अलग-अलग नक्शे में तब्दील किया है, ये जानना-समझना अपने आप में दिलचस्प है.


लेखक विनीत कुमार मीडिया क्रिटिक हैं। इसके अलावा इन्होंने ‘मंडी में मीडिया’ नामक किताब भी लिखी है।


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