नमस्कार मैं कूड़ा बोल रहा हूं


आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

नमस्कार| कल मैंने और मेरे समाज ने आपका भाषण सुना। आप हमें घरों से लेकर शहरों तक से निकालने की बात कह रहे थे|पर उस वक़्त हमारी हिम्मत और भी टूट गयी जब आपके इस खिलाफ़त आन्दोलन का,इस शाजिश का सभी ने तालियों से स्वागत किया।

पर आज मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि जब मैं आपके शरीर,समाज और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा हूँ तो आप मुझे कैसे जड़ से ख़त्म कर पायेंगे? पहले तो लोगों ने मुझे घर से बेदखल कर दिया,फिर किसी कूड़ेवाले ने मुझे वीरान जगह छोड़ दिया, नगर निगम ने शहर से निकाल दिया,पर आप ही बताये, हम जाये, तो कहाँ जाये? इतना ही नहीं आपके नमामि गंगा ,सफामी यमुना जैसे मुहिमों ने हमें घृणा की वस्तु बना दी है| मेरे अकेलेपन का यह आलम है कि अब तो मेरे प्रिय मित्र झाड़ू ने मेरे व्हाट्सएप्प को ब्लॉक और फेसबुक से अनफ्रेंड कर दिया है और इसकी वजह आप नेता है, जो उसे वी.आई.पी बनाकर सफाई की जगह जयकारे लगाते हैं|

आप कहते हैं कि आप प्रधानमन्त्री नहीं प्रधानसेवक हैं, तो हमारी भी एक सेवा करिए|जिस प्रकार जातिगत राजनीति आप के समाज का एक प्रमुख वोट बैंक है,उसी प्रकार आप हमें भी वर्गीकृत कर दीजिये| प्रायः प्लास्टिक जाति की यह शिकायत रहती है कि उन्हें मल-मूत्र के साथ रखा जाता है,और कांच परिवार की शिकायत रहती है कि उन्हें नाले ,छिलके ,जूठन आदि के साथ रख दिया जाता है| इसलिए हमारे और हमें उठाने वाले उन बाल कबाड़ियों के लिए,हमें बायोडिग्रेडेबल,नॉन बायोडिग्रेडेबल या फिर ड्राई और नॉन ड्राई जाती बना कर अलग अलग कूड़ादान प्रदान करें|ताकि सबके लिए अलग अलग स्कूल ,कॉलेज,दंड और मृत्यु हो|

आखिर में, मैं कूड़ा आपसे से विनती करता हूँ कि हमें भी मेक इन इंडिया में जगह दे,क्योंकि हम तो पहले से ही ‘मेक इन इंडिया’, ’मेड बाई इंडिया’ , ‘यूज़्ड बाई इंडिया’ और ‘थ्रोन बाई इंडिया’ है |हमारा महत्व समझिये क्योंकि हर कूड़े का ढेर अपने आप में बदलती सभ्यता का इतिहास है| कैडबरी ने किटकेट को कब हराया,लत्ते द्य्पेर्स कब बन गए और कब गर्ल्स डीयो ने बॉयज डीयो के साथ बटवारा कर लिया,इन सबका ओपिनियन पोल मैं ही तो हूँ|

अतः मेरी देश भक्ति पर प्रश्न चिन्ह न लगाते हुए, मेरी व्यथा समझने की कृपा करे| आशा करता हूँ कि हमें संयुक्त राष्ट्र तक नहीं जाना पड़ेगा और कूड़ा समाज के लिए आप जल्द ही अच्छे दिन लायेंगे|

सधन्यवाद,
आपके प्रिय अभियान का मुख्य कारण
‘कूड़ा’


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