cbi vs maharashtra government

सरकारें और पार्टियां हैं खिलाड़ी, फुटबॉल बनकर रह गई है CBI


केंद्रीय जांच एजेंसी यानी सीबीआई. इस संस्था का नाम है. मतलब एकदम भौकाल ही है. अकसर बड़े-बड़े मामलों में मांग की जाती है CBI से जांच कराने की. कई बार बड़े-बड़े मामलों में खुलासा भी होता है. लेकिन इसकी आजादी पर हमेशा से सवाल उठते रहते हैं. होना तो यह चाहिए कि बिना किसी लाग-लपेट के सीबीआई स्वतंत्र हो. सीबीआई की जांच ऐसी हो कि अपराधी और भ्रष्टाचारी नाम सुनकर ही कांप उठें. लेकिन नेताओं और अपराधियों ने CBI को सिर्फ मज़ाक बनाकर रख दिया है.

सीबीआई पर ही लगने लगे बैन

पिछले एक-डेढ़ साल में कई राज्यों ने CBI पर ही प्रतिबंध लगाए हैं. इस प्रतिबंध का मतलब है कि बिना राज्य सरकार की अनुमति के सीबीआई कोई भी जांच या छापेमारी नहीं कर सकती है. इन राज्यों की दलील है कि सीबीआई केंद्र सरकार यानी मोदी सरकार के इशारे पर काम कर रही है. ठीक यही आरोप हमेशा से विपक्ष के भी होते हैं.

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हमेशा से विपक्ष के निशाने पर रही सीबीआई

2014 के पहले बीजेपी और एनडीए में शामिल अन्य पार्टियां यही आरोप लगाती थीं कि सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है. अन्ना आंदोलन के वक्त इसका उदाहरण भी दिखा. अचानक से सीबीआई समेत तमाम केंद्रीय एजेंसियां किरण बेदी, संतोष हेगड़े, कुमार विश्वास, अरविंद केजरीवाल और खुद अन्ना हजारे के ही पीछे पड़ गई थीं.

कई राज्यों ने रोका CBI का रास्ता

सीबीआई की ऐसी ही मनमानियों से परेशान राज्य सरकारों ने बैन का रास्ता चुना है. ताजा मामला तो महाराष्ट्र का है लेकिन इसकी शुरुआत चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र प्रदेश में की. फिर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में सीबीआईCBI को रोका. राजस्थान में अशोक गहलोत ने भी बैन लगाया. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार ने भी सीबीआई के रास्ते रोक दिए. 

भारत में मजाक भर बनकर रह गई हैं सीबीआई जैसी संस्थाएं?

कानून क्या कहता है?

दरअसल, CBI का संचालन दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (डीएसपीई) ऐक्ट के तहत होता है. यह कानून कहता है कि केंद्र शासित प्रदेशों से बाहर किसी भी राज्य में राज्य सरकार की अनुमति के बिना CBI कोई जांच नहीं कर सकती है. हालांकि, संगीन मामलों में कोर्ट के आदेश के बाद जांच कराई जा सकती है. मतलब मोटा-माटी यह अर्थ निकलता है कि CBI मनमानी नहीं कर सकती है.

खाक में मिल गई है CBI की साख

CBI, जिसे एक स्वतंत्र संस्था होना चाहिए. वह सरकारों के हाथ की कठपुतली बन गई है. जिस पार्टी की सरकार होती है, उसके नेताओं को संरक्षण मिलता है. विपक्षियों को मनमर्जी के हिसाब से परेशान किया जाता है. कई बार तो CBI, ईडी समेत तमाम संस्थाओं के इस्तेमाल से इतना परेशान किया जाता है कि वह नेता सीधे पार्टी ही बदल ले. यही नेता इस तरफ़ आते ही पवित्र हो जाता है.

कुल मिलाकर CBI की अपनी कोई साख नहीं बचती है. राज्य सरकारें अपनी मर्जी से और केंद्र सरकार अपनी मर्जी से CBI का इस्तेमाल करती हैं. और CBI फुटबॉल की तरह इधर से उधर दौड़ती रहती है.


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