क्या हत्यारी भीड़ को बीजेपी सपोर्ट करती है?


राजनीति नाली है जिसमें बिना पांव गंदा किए नहीं घुसा जा सकता. इसमें बिना नैतिकता को ताक पर रखे एक कदम भी नहीं चला जा सकता. नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं. फिर तो किसी हत्यारोपी का फूल माला सजाकर पूजा करने में क्या ही जाएगा. केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने भी कुछ ऐसा ही किया. केंद्रीय मंत्री ने रामगढ़ मॉब लिंचिंग केस के आठ दोषियों पहले स्‍वागत किया और फिर उन्‍हें माला पहनाकर सम्मानित किया. सारे दोषी 29 जून से जमानत पर रिहा हुए हैं. खबर है कि दोषियों को जमानत मिलने के बाद भाजपा नेताओं में मिठाई बांटने का भी दौर शुरू हुआ है. लोग मिठाइयां बांट रहे हैं.

बेशर्मी का दूसरा नाम नेतागिरी है
27 जून 2017 को सौ गोरक्षकों की भीड़ ने पशु व्‍यापारी अलीमुद्दीन अंसारी को हजारीबाग जिले के रामगढ़ में पीट-पीटकर मार डाला था. इस मामले में फास्ट ट्रैकर कोर्ट ने 21 मार्च को 11 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी. अदालत द्वारा सजा सुनाने के बाद व्यक्ति अपराधी सिद्ध हो जाता है लेकिन झारखंड के हजारीबाग लोकसभा से भाजपा सांसद हैं. केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने भी कुछ नया नहीं किया. उन्होंने भी परंपरा निभाई है नेताओं की. नेतागिरी बेशर्मी का दूसरा नाम है.

जंग जीतकर आए सिपाही
जयंत सिन्हा यहीं तक नहीं रुके. उन्होंने इस केस में पुलिस की जांच पर भी सवाल उठाए हैं. फास्ट ट्रैक कोर्ट से सजा पाने के बाद दोषियों ने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया. दिलचस्प बात यह है कि जय प्रकाश नारायण सेंट्रल जेल से रिहा होने के बाद आठो दोषी सीधे जयंत सिन्हा के घर गए थे जहां उन्हें माला पहनाया गया. जैसे कोई किला जीतकर आए हों.

क्या है रामगढ़ मॉब लिंचिंग केस?
झारखंड का रामगढ़ इलाका. एक मीट व्यापारी अलीमुद्दीन अंसारी अपनी वैन में मांस लेकर आ रहा था. कुछ लोगों ने भीड़ में ही हंगामा मचाया कि वैन में बीफ है. बीफ के शक में भीड़ में से ही कुछ लोग बाहर आए और अलीमुद्दीन को पीट-पीटकर मार डाला. शक में किसी की भी जान जा सकती है.

भाजपा दागदार क्यों नहीं?
जिस पार्टी के हाथ में देश की बागडोर होती है उसकी जिम्मेदारी भी होती है. प्रदेश में उसकी सरकार हो तो जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. सरकार सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए नहीं होती. सरकार इन्हें रोकने के लिए होती है. बीफ रखने या ले जाने के शक में अब तक कई जानें जा चुकी हैं. हिंदू होने का सीधा सा मतलब होता है कि व्यक्ति गोरक्षक है और नाम के आगे मुसलमान है तो वह गोभक्षक है. हर मांस व्यापारी बीफ रखने का दोषी नहीं है. लेकिन एक अफवाह ही काफी है उसे गोकुशी का दोषी बनाने के लिए. फिर कुछ लोग भीड़ से निकल आते हैं जज बनकर जो गाय काटने की सजा सीधे मौत देते हैं. इस केस में कोई सुनवाई नहीं होती, सीधे फैसला दिया जाता है.

ऐसे में जब भीड़ को सत्ता का सहयोग मिल जाए तो क्या पूछना. उसे अराजक होने से कौन रोक सकता है. देश में इन दिनों वही चल रहा है. जयंत सिन्हा ने ठीक ही किया है. भीड़ की ताकत बढ़ेगी. लोगों में भरोसा आएगा कि नेता जी तो लोवर कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक बचा लेंगे. बीफ पॉलिटिक्स के चक्कर में व्यक्तिगत दुश्मनी भी मुसलमानों से निकाल ली जाएगी. फिर हत्याओं का और राजनीति का कनेक्शन ठीक ढंग से बनेगा.
कई बार लगता है क्या चल रहा है देश में. इन परिस्थितियों में किसी का दिमाग सुन्न हो जाए. ऐसा लगता है कि देश का माली बाग उजाड़ने की फिराक में है. ऐसे में  बाग कौन बचाए. हम आप तो हत्यारे हैं.


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