पद्मावत विवाद: इस पर गर्व करें या शर्म?


मै फ़िल्म पद्मावत से जुड़ी हर खबर, हर बात पिछले कुछ महीनों से सुन और पढ़ रहा हूँ। कुछ खबरें हमें एक भारतीय नागरिक होने की वजह से निराश कर रही हैं। फ़िल्म पद्मावत ( फ़िल्म पद्मावती का बदला हुआ नाम) के मुद्दे पर बहुत बातें हुई, बहुत आर्टिकल भी लिखे गए लेकिन पद्मावत अब एक फ़िल्म मात्र नहीं रह गयी है।

पद्मावत किसी के लिये राजनीतिक मुद्दा, किसी के लिए मान-सम्मान और किसी के लिये सबकुछ दाव पर लगने जैसी बात हो गयी है। पद्मावत के मुद्दे से सिर्फ एक बात नहीं बहुत सी बातें निकल कर बाहर आती हैं। पद्मावत विवाद हमसे बहुत से सवाल भी पूछता है। क्या लोकतंत्र में विरोध का ऐसा स्वरूप होना चाहिए? क्या कला से जुड़े लोगों की कोई अहमियत नहीं? क्या किसी की 2 साल की मेहनत को ऐसे सिरे से नाकारा जाना सही है? क्या खुलेआम धमकी और न्यायपालिका,संविधान की तौहीन जायज है?

अब कोई यह कहे कि पद्मावत सिर्फ एक फ़िल्म है तो ऐसा कहना बेमानी होगी। पद्मावत मुद्दे से सबसे बड़ी कोई चीज़ निकलकर आई है तो वह है करनी सेना क्योंकि कल तक इन्हें राजस्थान के बाहर शायद ही कोई जानता हो लेकिन आज पूरा भारत जान चुका है। अच्छी खासी मीडिया कवरेज भी मिल रही है। भारत ही क्या विदेशों में भी इनके चर्चे हो रहे होंगे क्योंकि इस सेना ने ऐतिहासिक मुद्दों को ढ़ाल बना कर जातिवादी हिंसा को आगे बढ़ाया है। इनको पूरे भारत में जातिवाद से निकले युवा नेताओं से लेकर बुजुर्ग नेताओं तक सबका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भरपूर सहयोग मिल रहा है।

इस मुद्दे की शुरुआत और करनी सेना तब लाइमलाइट में आई थी जब राजस्थान में पद्मावत के निर्देशक और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित ‘संजय लीला भंसाली’ के साथ हाथापाई की गयी थी, तब मुद्दा यह था कि भंसाली ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ की है। रानी पद्मावती और ख़िलजी के बीच कोई ड्रीम सीक्वेंस शूट कर रहे हैं। धीरे-धीरे जब रिलीज की तारीख नजदीक आती गयी यह बात स्पष्ट हो गया कि ऐसा कोई भी सीन नहीं है फ़िल्म में। भंसाली ने लिखित तौर पर और वीडियो के माध्यम से भी ये स्पष्ट किया कि फ़िल्म में कोई ऐसा सीन नहीं जिससे किसी की भावना आहत हो। जिसने भी फ़िल्म देखी सबका यही कहना था कि फ़िल्म में राजपुताना गौरव का सिर्फ ध्यान ही नहीं रखा गया है बल्कि राजपूतों की आन-बान और शान का महिमामंडन भी किया गया है लेकिन करनी सेना ने सारेे स्पष्टीकरण के बावजूद भी कोई ना कोई बहाना कर फ़िल्म के विवाद को और हवा दी।

अब रानी पद्मावती का पता नहीं लेकिन यह करनी सेना के मान-सम्मान की बात जरूर हो गयी है इसलिए करनी सेना एक बच्चे की तरह ज़िद्द कर रही है कि कुछ भी हो फ़िल्म को वो अब रिलीज़ नहीं होने देगी और कुछ राज्य की सरकारें बच्चे के प्यार में अंधें पिता की तरह उनकी ज़िद्द का समर्थन कर रही है, चाहे मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान की सरकार हो या पंजाब और हरियाणा की सरकार हो। सेंसर बोर्ड ने अंततः इसमें कुछ संशोधन के बाद इसे रिलीज के लिए प्रमाणपत्र दे दिया लेकिन फिर भी बात बनी नहीं और हर मामले की तरह इसमें भी न्यायालय का हस्तक्षेप हुआ वो भी सर्वोच्च न्यायालय का। फैसला आया कि फ़िल्म पूरे देश में रिलीज होगी लेकिन जिद्दी बच्चे के पिता यानि कुछ राज्य की सरकारें सर्वोच्च न्यायालय से दोबारा इस फैसले पर पुनर्विचार करने की बात कही।

सर्वोच्च न्यायालय ने फिर लताड़ा और कहा कि कुछ अतिवादियों के सामने आप घुटनें नहीं टेक सकते, कानून व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। अब पिता (सरकार) क्या करे, दादा ( सर्वोच्च न्यायालय) की बात सुने या जिद्दी बच्चे की जिद्द( करनी सेना) पूरी करे। घोर धर्मं संकट में फंसी हुई है।

अब बात मुद्दे की फ़िल्म पद्मावत विवाद पर न्यायालय, संविधान और लोकतंत्र की खुलेआम धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। सरकारें और उनके सरकारी तंत्र मूकदर्शक बने हुए हैं। कोई भी यह कहने को तैयार नहीं की इस लोकतंत्र में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती। सब चुपचाप जलते हुए शहर देख रहे हैं। खुलेआम मीडिया चैनलों पर धमकियां दी जा रही हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही। दुःख तो इस बात का है कि आज के युवा का इस गन्दी राजनीति में सबसे ज्यादा योगदान दे रहे हैं। ये अतिवादी सरकारी बसों में आग लगा रहे हैं, मासूम बच्चों पर पत्थर चला रहे हैं,पब्लिक प्रॉपर्टी में तोड़फोड़ कर रहे हैं, सड़क जाम कर रहे हैं और हर वो कार्य कर रहे हैं जिससे इस देश को और देश के नागरिकों को नुकसान हो रहा है। ये खुद को सच्चा देशभक्त कह रहे हैं, क्या ऐसे होते हैं देशभक्त? मेरी नजर में तो ऐसे लोग देशद्रोही होते हैं।

यह पद्मावत नाम की किसी फ़िल्म की बात नहीं है ये हमारे महान देश कि छवि बिगाड़ने की बात है, हम हिंसा रूपी आग में झुलसने को बेताब हैं, आज का युवा इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है। आज का युवा राजनीतिक मोहरा बनता जा रहा है। आने वाली पीढ़ी भविष्य में आज के इतिहास से जब रूबरू होगी तो उसे मिलेगा कि इतिहास के नाम पर भारत के कुछ अतिवादियों ने केवल कयासों के आधार पर एक फ़िल्म को बिना देखे अपने देश के संविधान और लोकतंत्र को ताक पर रख कर उसे हिंसा की आग में झोक दिया। अब मैंने भी फ़िल्म देख ली है, फ़िल्म में ऐसा कोई भी दृश्य नहीं जिससे किसी की भावना आहत हो।

ये फ़िल्म सिर्फ और सिर्फ राजपूतों की वीरता और रानी पद्मावती के तेज, त्याग और बलिदान को दर्शाता है। इस फ़िल्म में ख़िलजी को अय्याश,लुटेरा, क्रूर और पीठ पर वार करने वाला सुल्तान दिखाया गया है। इसलिए अन्धविरोध से दूर रहे और बिना अपनी आँखों से देखे, बिना अपनी कानों से सुने किसी और की कही बातों पर विश्वास ना करें। खुद देखे, सुने, परखें और फिर कोई फैसला लें। ऐसा अन्धविरोध देश और समाज के लिये हानिकारक साबित हो सकता है।


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