narco test kya hai

नार्को टेस्ट में आखिर होता क्या है, जिसपर इतना हंगामा हो रहा है?


हाथरस केस में यूपी सरकार जाग गई है. जागी ऐसी है कि कुछ अधिकारी सस्पेंड हुए हैं. पहले एसआईटी फिर पॉलीग्राफ (polygraph test ) और नार्को टेस्ट (Narco test)  के आदेश दिए गए. अब सीबीआई जांच के आदेश दे दिए गए हैं. इस बीच सबसे ज्यादा चर्चा नार्को टेस्ट की हो रही है. आदेश में कहा गया है कि मामले में शामिल रहे आरोपियों, पीड़ित परिवार और पुलिस का नार्को टेस्ट किया जाएगा। अब आरोपी के परिवार तो नार्को टेस्ट के लिए तैयार हैं लेकिन पीड़ित परिवार के लोग इससे इनकार कर रहे हैं. आइए जानते हैं कि ये नार्को टेस्ट क्या बला है, जिसने इतना हंगामा मचा दिया है:-

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आपने फिल्मों में लाई डिटेक्टर मशीन देखी होगी. इसमें इंसान की खोपड़ी में हेल्मेट जैसा कुछ पहनाते हैं. हाथ-पैर में बैटरी वाली चिमटी की तरह कुछ पकड़ा
देते हैं. और जब आदमी झूठ बोलता है तो लाल बत्ती जलती है, नहीं तो हरी बत्ती. ये तो खैर फिल्मी खेला है लेकिन होता कुछ-कुछ ऐसा ही है.

पॉलीग्राफ टेस्ट (polygraph test ) क्या है?

 

झूठ पकड़ने की मशीन भी कहते हैं इसे

झूठ पकड़ने की मशीन भी कहते हैं इसे

इसमें माना जाता है कि अगर आप किसी कठिन सवाल के जवाब में बचने के लिए झूठ बोलते हैं तो आपके शरीर पर इसका असर दिखता है. यही पकड़ने के लिए इंसान के शरीर में कुछ मशीनें लगाई जाती हैं और ब्लड प्रेशर, पल्स, सांस और कई अन्य चीजों पर नजर रखी जाती है. ऐसे में अगर आदमी झूठ बोलके के चक्कर में घबरा जाता है तो उसकी चोरी पकड़ी जाती है. हालांकि, इसमें पूछे जाने वाले सवाल इस टेस्ट की क्वालिटी तय करते हैं. मान लीजिए कोई हत्या का आरोपी है लेकिन उससे यह पूछा ही न जाए कि उसने हत्या की है या नहीं, ऐसे में वह टेस्ट में बच सकता है. कुछ लोग विशेष ट्रेनिंग से भी इस टेस्ट में बच जाते हैं, यही कारण है कि इसे 100 प्रतिशत सही नहीं माना जाता है.

हाथरस केस: इन सवालों के जवाब शायद कभी नहीं मिलेंगे

नार्को टेस्ट क्या होता है?

नार्को टेस्ट में पहले एक सुई लगाई जाती है. इस सुई में सोडियम पेंटोथाल होता है. इसकी वजह से इंसान अपना दिमाग ज्यादा दौ़ड़ा नहीं पाता है और ना चाहकर भी अकसर सच ही बोल देता है. इसी की ज्यादा मात्रा का इस्तेमाल बेहोश करने के लिए भी किया जा सकता है. कहा जाता है कि विश्व युद्ध के दौरान भी इसका इस्तेमाल खूब हुआ था. आजकल जांच एजेंसियां थर्ड डिग्री टॉर्चर की बजाय नार्को टेस्ट को वरीयता देती हैं. हालांकि, इसकी गारंटी नहीं है कि कोई इससे बच नहीं सकता है.

इन टेस्ट पर कानून क्या कहता है?

साल 2010 में सेल्वी और अन्य बनाम कर्नाटक सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरोपी के सहमत हुए बिना यह टेस्ट नहीं किया जा सकता है. मतलब अगर आरोपी टेस्ट देने के लिए हामी न भरे तो उसका टेस्ट नहीं हो सकता है. हालांकि, इसमें भी कुछ अपवाद हैं. टेस्ट देने की स्थिति में इसके सभी पहलू आरोपी को बताए जाने होंगे. साथ ही टेस्ट के दौरान साल 2000 में आई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइन का भी सख्ती से पालन किया जाएगा.

अपराधों पर पुलिसिया लीपापोती और आरोपियों के पक्ष में खड़े ट्रोल

खुद से टेस्ट देने की स्थिति में आए नतीजे कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश भी किए जा सकते हैं. एक उदाहरण और समझिए. अगर आरोपी टेस्ट में हत्या में इस्तेमाल हुए हथियार की जगह बताता है और हथियार वहीं मिलता है, तो हथियार तो सबूत माना जाएगा लेकिन उसका बयान नहीं. पिछले कुछ सालों में रेप केस में आरोपी और संदिग्धों पर यह टेस्ट किया गया है.


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