चंद्रशेखर ‘रावण’ को छोड़ना बीजेपी की चालाकी है या मूर्खता?


चंद्रशेखर रावण को तो आप जानते ही होंगे? वही भीम आर्मी वाले। वही भीम आर्मी जिसने दलितों को दम भरना सिखाना शुरू किया तो इसे बनाने वाले चंद्रशेखर को बीजेपी की सरकार ने रासुका कानून के तहत जेल में ठूंस दिया। अब बीजेपी को 2019 की कुर्सी हासिल करनी है तो दलितों पर विशेष प्रेम उमड़ रहा है। पहले एससी-एसटी ऐक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना और फिर दलितों पर गाहे-बगाहे मेहरबानी दिखाने की कोशिश।

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने चंद्रशेखर रावण को जेल से रिहा कर दिया है। बताते चलें कि 2017 से जेल में बंद रावण को 1 नवंबर को रिहा किया जाना था लेकिन ‘दरियादिली’ दिखाते हुए रावण को जल्दी छोड़ा गया। अब इसके पीछे बीजेपी सरकार की क्या मंशा है, यह तो वही जानती है लेकिन इतना निश्चित है कि रावण इतनी आसानी से बीजेपी को नहीं छोड़ने वाला है।

दलितों का फायर ब्रैंड नेता है चंद्रशेखर! 
सहारनपुर में दलित आंदोलन के वक्त हुए दंगों के बाद जब रावण को जेल में बंद किया गया, तब से लेकर अब तक वह पश्चिमी यूपी में दलितों के बीच काफी पॉपुलर हो गए हैं। रावण के अलावा भीम आर्मी भी इस युवा तुर्क की अनुपस्थिति में भी खूब फूली-फली है। दलितों को एक ऐसा नेता मिला है, जो टोटल फायर ब्रैंड है।

जेल से निकलते ही रावण ने साफ जाहिर कर दिया है कि वह भी बदला लेने के मूड में हैं। रावण ने कहा है कि 2019 में वह बीजेपी को हराने के लिए गठबंधन का साथ देंगे। हालांकि, इसका उदाहरण बीजेपी को पहले ही नूरपुर और कैराना के उपचुनावों में देखने को मिल गया है। ऐसे में रावण के बाहर होने पर दलित कहीं और जाएंगे, यह मानना थोड़ा कठिन है।

रावण की पूरी राजनीतिक छवि दलित संगठन भीम आर्मी के मुखिया और कट्टर बीजेपी विरोधी की रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि वह 2019 के चुनाव में ना सिर्फ पश्चिमी यूपी बल्कि पूरे यूपी में दलितों को बीजेपी के खिलाफ खड़ा करेंगे। उन्होंने बयान में भी कह दिया है कि कोई भी दलित कमल पर वोट नहीं देगा। भले ही भीम आर्मी खुद चुनाव न लड़े लेकिन वह संगठित विपक्ष की ताकत को और बढ़ा सकती है।

मायावती को मिलेगी मजबूती?
खुद को दलितों की एकमात्र पार्टी बताने वाली बीएसपी नेता मायावती अब अपने धुर-विरोधी रहे समाजवादियों के साथ हैं। हालांकि, अभी तक गठबंधन की रूपरेखा तय नहीं हो पाई है। पश्चिमी यूपी में अखिलेश यादव ने कैराना उपचुनाव में जो सोशल इंजीनयरिंग दिखाई थी, उसने बीजेपी के होश उड़ा दिए। मुस्लिम, जाट, यादव और दलितों को साधकर अखिलेश, मायावती और जयंत चौधरी ने गठबंधन की जमीन तैयार की। अब अगर रावण भी इस गठबंधन का हिस्सा बनते हैं और वह खुद भी चुनाव में उतरते हैं तो बीजेपी के लिए पश्चिमी यूपी की सभी सीटों पर मुश्किल हो जाएगी।

 

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यूपी हार सकती है बीजेपी!
एससी-एसटी ऐक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के चलते सवर्ण समाज बीजेपी से काफी नाराज है। अकसर लोग यह कहते पाए जाते हैं कि इस बार नोटा पर बटन दबाकर बीजेपी को आईना दिखाएंगे। बीजेपी के परंपरागत वोटर रहे सवर्ण अगर थोड़ा सा भी उसका साथ छोड़ते हैं और मायावती-अखिलेश के नेतृत्व में गठबंधन ढंग से चुनाव लड़ता है तो बीजेपी के लिए 2014 में जीत की मुख्य वजह बने यूपी में उसका पत्ता साफ हो सकता है।

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दलितों और सवर्णों के बीच फंसी बीजेपी
दलितों की हत्या, मॉब लिंचिंग और कई अन्य मुद्दों पर बुरी तरह फंसी बीजेपी के लिए एससी-एसटी ऐक्ट गले की फांस बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने से दलित समाज तो संतुष्ट हुआ नहीं बल्कि सवर्ण समाज और नाराज हो गया। ऐसे में बीजेपी के लिए स्थिति आगे कुआं पीछे खाई वाली है। अगर वह फिर से ऐक्ट में कुछ बदलाव करती है तो दलितों के नेताओं, जिसमें रावण भी शामिल हैं को शानदार मौका मिल ही जाएगा। अगर बीजेपी कोई बदलाव नहीं करती है तो सवर्ण गोरखपुर की तरह वोट देने ही नहीं जाएंगे, ऐसी प्रबल संभावना है।


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