ओबीसी राजनीति

ओबीसी आरक्षण: मंडल आंदोलन से निकली पार्टियों को समेट देगी बीजेपी?

ओबीसी आरक्षण का मामला एक बार फिर गर्म है. उत्तर प्रदेश के चुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार के कदम ने इसकी प्रासंगिकता और बढ़ा दी है. केंद्र की मोदी सरकार ने संसद में उस बिल को पास करा लिया है, जिससे ओबीसी आरक्षण और जातियां तय करने का काम फिर से राज्य सरकारों को मिल जाएगा. इसके अलावा, 2017 की ही तरह बीजेपी ने ओबीसी वोट के लिए जमकर मेहनत शुरू कर दी है.

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आने वाले समय में सबसे बड़ा चुनाव उत्तर प्रदेश का है. इसके अलावा, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई राज्यों समेत पूरे देशभर में ओबीसी वोट निर्णायक भूमिका में हैं. कोरोना की दूसरी लहर के बाद उपजे हालातों ने कुछ यूं स्थिति बनाई की बीजेपी बैकफुट पर आ गई. उत्तर प्रदेश बीजेपी में ही स्थिति सिरफुटौव्वल वाली होने लगी. हालांकि, बीजेपी ने संघ के साथ मिलकर इसका तोड़ निकालने की कोशिश की है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल किया गया. ओबीसी कोटे से आने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़ाई गई और अलग-अलग जातियों का प्रतिनिधित्व दिखाने की कोशिश भी की गई.

फंसने लगी बीजेपी तो याद आए पुराने साथी


इसी क्रम में उत्तर प्रदेश से अनुप्रिया पटेल को भी मंत्री बनाया गया. अनुप्रिया पटेल 2014 से 2019 तक मंत्री थीं, लेकिन 2019 में मोदी सरकार बनने के बाद उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली. कोरोना की दूसरी लहर के बाद बीजेपी मुश्किल में दिखी, तो अनुप्रिया के साथ-साथ निषाद पार्टी और कई अन्य छोटे दलों से न सिर्फ़ बात की गई बल्कि उन्हें फिर से समायोजित भी किया गया.

क्या जाति से आगे नहीं बढ़ पाएगी उत्तर प्रदेश की राजनीति?

उत्तर प्रदेश में यादवों और ओबीसी की पार्टी कही जाने वाली समाजवादी पार्टी बीजेपी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी है. 2017 में बीजेपी ने सपा को हराने के लिए, गैर यादव ओबीसी पर ध्यान दिया. इसी क्रम में अनुप्रिया पटेल को साथ लाकर कुर्मी वोट को जोड़ा गया. स्वामी प्रसाद और केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं ने ओबीसी को लामबंद करने में खूब पसीना बहाया.

ओबीसी, दलित और सर्वणों के समावेश से जीती बीजेपी


ओबीसी के अलावा बीजेपी ने गैर जाटव वोटों पर भी खूब मेहनत की. ओम प्रकाश राजभर, निषाद पार्टी और इसी तरह के कई छोटे दलों के सहारे कई ऐसी जातियों को जोड़ा गया, जिससे सपा का ओबीसी वोट और बसपा का दलित वोट टूट गया. इस सबमें सवर्णों को हिंदुत्व के नाम पर जोड़ा गया. कुल मिलाकर स्थिति ऐसी बन गई कि बीजेपी 300 से ज़्यादा सीटें ले आई थी.

अब यूपी के आगामी चुनावों से ठीक पहले बीजेपी ने ओबीसी आरक्षण कानून में संशोधन करके ऐसी ही एक और चाल चल दी है. देश भर में राज्यों को ओबीसी आरक्षण का अधिकार देकर, बीजेपी इसे केंद्रीय मुद्दा नहीं बनने देना चाहती है. विपक्ष जातिगत जनगणना की बात ज़रूर कर रहा है, लेकिन बीजेपी यहां अपने मोहरे सेट कर रही है. यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ओबीसी वोट बड़ी संख्या में हैं. इसमें से कुछ में बीजेपी तो कुछ में कांग्रेस या उसके गठबंधन की सरकारें हैं. ऐसे में बीजेपी जिन मुद्दों पर खुद फंस सकती है, वही मुद्दे उसने विपक्ष के सामने भी खड़े कर दिए हैं.

चुनावी राज्यों में होगा ओबीसी आरक्षण का ट्रायल?


संभव है कि बीजेपी चुनावी राज्यों में आरक्षण में फेरबदल करके वोट का फायदा लेने की कोशिश करे और यह पेश करने की कोशिश करे कि राज्यों के पास अधिकार होने के बावजूद कांग्रेस शासित राज्यों में आरक्षण बढ़ाने या जातियों को शामिल करने की कोशिश नहीं हो रही है. बीजेपी ने बहुत सोच-समझकर सपा, बसपा, आरजेडी, जेडीयू और तमाम ऐसी पार्टियों को फंसाने की तैयारी की है, जो कमोबेश एक-दो जातियों की पार्टियां कही जाती हैं.

अगर उत्तर प्रदेश में बीजेपी का यह दांव सफल होता है और ओबीसी वोट उसकी तरफ शिफ्ट होता है, तो बीजेपी सत्ता बचा लेगी. 2022 में बीजेपी अगर यूपी में बंपर जीत हासिल कर लेती है, तो सपा और बसपा जैसी पार्टियों के अस्तित्व पर बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा. साथ ही, 2024 के लिए लामबंद होने की कोशिश में जुटे विपक्ष को भी बड़ा झटका लगेगा. ओबीसी वोट अगर बीजेपी का वोटर बनने की ओर अग्रसर हो गया, तो मंडल आंदोलन से निकली पार्टियां खत्म होने की कगार पर आ जाएंगी और उन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए कुछ नया सोचना होगा.

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