संजू: नेताओं और ‘भाई’ को बचाने की एक सफल कोशिश


रणबीर कपूर हू-ब-हू संजय दत्त लगे हैं। वाक़ई बहुत मेहनत कराई है हिरानी ने उनसे। कई बार संजू बाबा दिखने की मेहनत इतनी हुई है कि चेहरा ही एक्सप्रेशन विहीन दिखाई देने लगता है रणबीर का। मनीषा कोईराला का रोल बहुत छोटा है लेकिन काफ़ी हद तक नरगिस को जस्टिफ़ाई करता है। परेश रावल की कास्टिंग बहुत ग़लत हुई है। सुनील दत्त जैसे लंबे-चौड़े पंजाबी के लिए कम क़द वाले और गुजराती लहजे वाले परेश को क्यूँ चुना हिरानी ने, भगवान ही जानें!

हिरानी मशहूर हैं, अपने इंटेलिजेंट स्क्रीनप्ले के लिए। जो बातें कहने के लिए अनुराग कश्यप को ऐक्टिविज्म करना पड़ता है। वह हिरानी एंटरटेनमेंट में कह जाते हैं लेकिन शायद यहाँ कुछ लोगों ने रोक दिया हिरानी को, एंटरटेनमेंट के मामले में यह फ़िल्म बिलकुल हिरानी की अन्य फ़िल्मों जैसी है लेकिन हिरानी अपनी बातें नहीं कह पाए।

संजय की पहली दोनो शादियां पिक्चर से ग़ायब रहीं, मान्यता से शादी का फ़ैसला अपने आप में ख़ुद एक फ़िल्म है लेकिन वो भी चैप्टर ग़ायब रहा। ड्रग्स के बाद सीधे AK-56 और फिर मुन्नाभाई…..एक भी पोलिटिशियन का नाम छोड़िए काल्पनिक कैरेक्टर तक नहीं इस्तेमाल किया गया। संजू के अंडरवर्ल्ड के रिश्तों को बहुत ख़ामोशी से निबटा दिया गया। ऐसा लग रहा था, जैसे हिरानी ने जब यह फ़िल्म प्लान की थी तो बहुत कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि संजय दत्त के बारे में खुलकर कहोगे तो कई ज़िंदा मुर्दा पोलिटिशियन्स, पूँजीपति और भाई लोग ख़तरे में आ जाएंगे और हिरानी मन मसोस कर रह गए शायद!

फ़िल्म लम्बी है लेकिन एंटरटेनिंग है। बिलकुल भी निराश नहीं करेगी, फ़िल्म का हीरो संजय दत्त नहीं बल्कि सुनील दत्त हैं। संजय दत्त सिर्फ़ एक वजह हैं जो सुनील दत्त का हीरोइक नेचर बाहर निकाल कर लाती है। अगर आप सुनील दत्त साहब की इज़्ज़त नहीं करते थे तो करने लगेंगे और अगर करते थे तो बहुत बढ़ जाएगी। सुनील दत्त जैसे बेहतरीन इंसान को राजकुमार हिरानी फिल्म्स की बेहतरीन श्रद्धांजलि।

 

यह फिल्म समीक्षा हैदर रिजवी के फेसबुक वॉल से ली गई है।


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