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स्मृतिशेषः मिथक और इतिहास की आंख से वर्तमान को देखते थे कुंवर नारायण


‘स्वांत:सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा।’ रामचरितमानस के बालकांड के शुरुआती चरण में रामचरित के सबसे बड़े महाकव्य के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास यह घोषणा करते हैं कि इस महाकाव्य की रचना स्वांतःसुखाय यानी कि अंत-करण के आनंद के लिए की जा रही है। आज इस तथ्य का वर्णन इसलिए आवश्यक है कि लगभग इसी वैचारिक गोत्र का एक आधुनिक तुलसीदास कल दुनिया को अलविदा कह गया और साहित्य से लेकर बौद्धिक विमर्श के हर मंच पर उसे उसके इसी गुणधर्म के आधार पर याद किया जा रहा है। 19 सितंबर 1927 को फैजाबाद में पैदा हुए कुंवर नारायण के लिए कविता कर्म शायद स्वांतः सुखाय की धारणा की परिधि से बाहर नहीं था। एक संपन्न व्यावसायिक घराने से संबंध रखने वाले कुंवर नारायण अपने कवित्व को बाजार के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्त रखने के लिए पारिवारिक धंधे में भी उतरते हैं और इससे साहित्य के प्रति अपने समर्पण को हर तरह से अप्रभावित रखने की कोशिश में सफल भी होते हैं। खुद कुंवर नारायण के लहजे में इस बात को आसानी से समझा जा सकता है जिसमें वे कहते हैं कि साहित्य का धंधा न करना पड़े इसलिए मोटर का धंधा करता हूं।

कुंवर नारायण को हिंदी साहित्य में शांति और संतुष्टि के साथ बिना विवादों के जाल में उलझे अपना काम करने वाले साहित्यकार के रूप में जाना जाता है। राजनीति या फिर समाजनीति की विसंगतियों पर बिना विवादित हुए चुपचाप करारा प्रहार कर सकने की जो क्षमता कुंवर नारायण में थी वो शायद किसी भी कलात्मक विधा के शिखर पुरुषों में दुर्लभ है। 90 साल का जीवनकाल जिसमें तकरीबन आधी सदी का वक्त उनकी साहित्यिक-साधना का साक्ष्य है और जिसमें उनके नाम तमाम श्रेष्ठता के भौतिक प्रतिमानों वाले पुरस्कारों की एक बड़ी संख्या शामिल है, इन सबके बीच उनकी यथार्थपरक जीवनशैली, सादगीपूर्ण आचार और सामाजिक दायित्वबोध ने उन्हें किसी भी तरह के व्यर्थ विवादों से काफी दूर रखा हुआ था। कोमल भावनाओं को सरलतम शब्दों में अभिव्यक्त करने की उनकी क्षमता ही उनके रचनात्मक उत्पादों के उपभोक्ता-परिसर के दायरे को बहुत व्यापक बनाती है। कुंवर फैज़ाबाद के हैं। वही फैज़ाबाद जहाँ वह अयोध्या है जिसका शाब्दिक अर्थ उसके सनातन अजेयता के घोषणा की तरह है। शायद इसीलिए अयोध्या के दर्द को उनसे बेहतर उस दौर में कोई नहीं समझ सकता था। इसीलिए कवि कुंवर नारायण स्वयं अयोध्या बनकर शायद नारायण से कहते जान पड़ते हैं कि

हे राम!..
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है !
हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान – किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक….
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !

कुंवर नारायण की काव्यगत विशेषताओं में शीर्ष पर है उनकी इतिहास और मिथकों की आँख से समकालीन परिदृश्य को देखने की दृष्टि। उपर्युक्त काव्यांश उनकी इस काव्यगत शैली का एक छोटा सा नमूना भर है। कुंवर जी की अन्य रचनाएं उनके विषय में इस धारणा को और पुष्ट करती दिखाई पड़ती हैं। ‘आत्मजयी’ प्रबंध काव्य में जहाँ उन्होंने कठोपनिषद के ‘नचिकेता प्रसंग’ की आधार-भूमि पर आधुनिक मनुष्य के जटिल मनः स्थितियों की शानदार अभिव्यक्ति की है वहीं ‘वाजश्रवा के बहाने’ पिता-पुत्र की दो पीढ़ियों के बीच के अंतर के द्वन्द को प्रकट करने की कोशिश है।

“अच्छा हुआ तुम लौट आए,
मेरे जीवन में
लेकिन जानता हूँ
नहीं आ सकोगे
-चाहकर भी नहीं-
वापस मेरे युग में।।”

इसी संदर्भ में उनकी इस कविता को कौन केवल कृष्ण-सुदामा की मिथक कथा मानेगा जबकि इसमें आधुनिक परिप्रेक्ष्य का दर्शन साफ़-साफ़ दिखाई दे जाता है-

“कैसी बांसुरी? कैसा नाच? कौन गिरिधारी?
जिस महल को तुम
भौंचक खड़े देख रहे हो
वह तो उसका है
जिसकी कमर की लचकों में
हीरों की खान है।
बहुत भोले हो सुदामा
नहीं समझोगे इस कौतुक को..”

कुंवर उस दौर में कलम उठाते हैं जब वैश्विक इतिहास द्वितीय विश्वयुद्ध, भारतीय स्वाधीनता संग्राम और गांधी युग जैसे उल्लेखनीय घटनाक्रमों से साक्षात्कार कर रहा था। 11वीं तक विज्ञान के विद्यार्थी रहने के बाद उन्होंने लखनऊ विश्विद्यालय से 1951 में अंग्रेजी लिटरेचर में एमए की डिग्री हासिल की। 1956 में उनका पहला काव्य संग्रह चक्रव्यूह प्रकाशित हुआ, जिसके बाद कुंवर नारायण तत्कालीन शिखर साहित्यकारों की नज़र में आ गए। उनकी इसी कृति से प्रभावित होकर 1959 में अज्ञेय ने जब तीसरा सप्तक प्रकाशित किया तब केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजयदेव नारायण साही के साथ इनकी रचनाओं को भी उसमें शामिल किया। यहीं से कुंवर नारायण की लोकप्रियता के प्रकाश ने अपनी तीव्रता बढ़ायी। 1965 में उनका दूसरा प्रबंध काव्य संग्रह ‘आत्मजयी’ प्रकाशित हुआ। कुंवर जी की प्रतिभा का प्रसार साहित्य की हर विधाओं की ओर था। निबन्ध, उपन्यास, कहानी आदि में भी उनकी कलम खूब चलती लेकिन कविताओं से उन्हें ज्यादा लगाव था और इसीलिए जीवन पर्यंत उनकी रचनाधर्मिता का केंद्र बिंदु कविताएं ही बनी रहीं। कुंवर नारायण अपनी कविताओं में जीवन की बात करते हैं, मृत्यु की बात करते हैं, प्रेम की बात करते हैं, मनुष्यता की पैरोकारी करते हैं लेकिन राजनैतिक सन्दर्भों से जुड़ी कविताएं उनके हुजरे में काम ही दिखाई पड़ती हैं। इससे यह कतई सिद्ध नहीं हो जाता कि कुंवर अपने समकालीन राजनैतिक विसंगतियों का प्रत्युत्तर देने के कर्तव्यबोध से पीछे हटने वाले कवि हैं बल्कि जब-जब उन्हें ऐसी प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता महसूस हुई है उन्होंने मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। साम्प्रदायिक-जातिगत-भाषायी और क्षेत्रीय आधारों पर नफरत की राजनीति को जवाब देते हुए कुंवर नारायण ने अपने अंदाज़ में लिखा है कि

“एक अजीब-सी मुश्किल में हूं इन दिनों
मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत
दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही है।
अग्रेंजो से नफरत करना चाहता
( जिन्होने दो सदी हम पर राज किया)
तो शैक्सपीयर आड़े आ जाते
जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं।
हर समय
पागलों की तरह भटकता रहता
कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए
जिससे भरपूर नफरत कर के
अपना जी हलका कर लूं!
पर होता है इसका ठीक उल्टा
कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी
ऐसा मिल जाता
जिससे प्यार किए बिना रह ही नहीं पाता!
दिनोंदिन मेरा यह प्रेम-रोग
बढ़ता ही जा रहा
और इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है
कि यह प्रेम किसी दिन मुझे
स्वर्ग दिखाकर ही रहेगा”

नफरत और दुर्भावना से भरी दुनिया में कवि की एक और हसरत की बानगी देखिये जिसमें वह कहता है कि

“इन गलियों से बेदाग गुजर जाता तो अच्छा था
और अगर दाग ही लगना था तो फिर
कपड़ों पर मासूम रक्त के छींटे नहीं
आत्मा पर किसी बहुत बड़े प्यार का जख्म होता
जो कभी न मरता।”

साहित्य से जुड़े तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कार मसलन साहित्य अकादमी पुरस्कार, कबीर सम्मान, व्यास सम्मान, हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान के साथ कुंवर नारायण को सर्वोच्च साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया लेकिन पुरस्कार उनके लिए केवल प्रोत्साहन का स्रोत बने रहे। कविताओं में प्रयोगधर्मिता के पक्षधर और हमेशा लीक से हटकर चलने वाली प्रवृत्ति के बावजूद भी उनका किसी भी वाद-विवाद से आजीवन पाला नहीं पड़ा और इसीलिए साहित्यकारिता के शीर्ष पर होते हुए भी जीवन भर अविवादित बने रहने वाले कुंवर नारायण के जाने से पूरा साहित्यिक गलियारा शोक-संतप्त है। उनके प्रयाण से उपजे शून्य की भरपाई उन्हीं के भरोसे इसलिए भी छोड़ी जा सकती है क्योंकि कुंवर नारायण लौट आने वाले कवि हैं, वो भी जैसे गए थे वैसे नहीं बल्कि उससे भी बेहतर, उससे भी बृहत्तर, उससे भी मनुष्यतर।

अबकी अगर लौटा तो
बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूंगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से।
अबकी अगर लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा।

अंतिम प्रणाम!


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