शबा का पिंक स्वेटर


अनुज को सब याद है….. पिंक स्वेटर का डिज़ाइन जो माँ ने खान आंटी से सीखा था, उस स्वेटर का ऊन जो चौक से खरीदकर खान अंकल लाए थे और ये कि वह कैसे पूरे दिन माँ और खान आंटी के बीच 1नंबर सलाई(कांटा) से लेकर नौ नम्बर की सलाई इस घर से उस घर सप्लाई किया करता था। शबा की माँ ने तो इस स्वेटर को कम ही बुना था। असल में तो यह अनुज की माँ के रूहानी हाथों द्वारा बुना गया था।

जिंदगी की कहानियां अक्सर ऐसी ही बुनी जाती हैं। समय बीतता जाता है और लोग अपने आप को उधेड़ बुनकर वक्त के हिसाब से तैयार कर लेते हैं। पिंक स्वेटर भी तो ऐसे ही तैयार हुआ था। थोड़ा शबा और अनुज के प्यार के बीच तो थोड़ा खान आंटी और दूबे आंटी की छोटी मोटी नोकझोंक के बीच।

फौजी क्वाटरों में सर्दियाँ किसी स्वेटर और टेबल क्लॉथ के डिजाइन को सीखते-बुनते ढलती हैं और इसके अंत तक कैंट के हर घर में सेम टेबलक्लॉथ, बेडशीट और स्वेटर बुने जा चुके होते हैं। जेसीओ साहब की बीवी ने वो डिजाइन किस हवलदार साहब की बीवी से सीखा, मिर्ची के अचार में खटाई कितनी पड़ेगी यह सब गुणा-भाग का जवाब खान आंटी के सिवाए और कोई नहीं जानता था। शाम को किस घर में क्या बनने वाला है, कौन से सीरियल में खलनायिका क्या कांड करने वाली है यह सब बातें खान आंटी और दूबे आंटी सुनहरी धूप में बैठकर साग चुनते और मटर छीलते हुए चिंतन-मनन कर अक्सर निपटा लिया करती थीं।

उधर एग्जाम्स आ चुके हैं तो अनुज और शबा को पढ़ाई के साथ अपने निजी मामले निपटाने का भी ज्यादा समय मिल रहा है। फिजिक्स में ग्रेविटेशन का इक्वेशन डेरिवेट हो या न हो प्यार के सारे इक्वेशन यहां रिलेट हो कर डेरिवेट हो चुके थे। दोनों ने तय कर लिया था कि आगे इंजिनियरिंग की जाएगी और पुणे की किसी आईटी कंपनी में कार्यरत रहने के दौरान क्रांति करके कोर्ट मैरिज की जाएगी।

इस दौरान पिंक स्वेटर बार-बार शबा को नापा जाता, फिर से ऊन उधेड़ दिए जाते और फिर से बुने जाते। यह क्रिया बारंबार चलती रही और जब  तक स्वेटर बुन कर तैयार हुआ….सर्दियां फुर्र हो चुकी थीं और शबा भी।

मामला सब ठीक चल रहा था कि शबा मैथ्स में फेल हो गई। खान अंकल रिटायर हो गए और शबा, शबा खान से बेगम शबा  बेग हो गई। शबा के निकाह में दूबे अंकल गए थे। दूबे आंटी ने शबा का वह पिंक स्वेटर अनुज के हाथों भिजवाया था पर वह स्वेटर कभी शबा तक नहीं पहुंचा। एनआईटी में पढ़ने के दौरान उसने कई बार सोचा कि पिंक स्वेटर शबा को दे आए पर उसकी हिम्मत जवाब दे जाती।

एक साल बाद जब अनुज ने मन पक्का कर शबा के पास जाने का प्लान भी बनाया तो जिंदगी अपने नए प्लान के साथ, अनुज के साथ खेल कर गई। शबा ने उसके शौहर के शहीद होते ही आत्माहत्या कर ली थी। शबा ने ऐसा क्यों किया और असल में क्या हुआ था… इस बारे में अनुज अब कुछ नहीं सोचता। उसे बस इतना पता है कि शबा नहीं तो क्या हुआ उसका वह पिंक स्वेटर तो उसके पास जिंदा है न!

शबा उस पिंक स्वेटर में कितनी प्यारी लगती थी। जब पहली बार वो स्वेटर बुन कर तैयार हो गया था तो वह हर दिन उसी को पहनकर घूमती थी। अगले ही ठण्ड वो थोड़ी सा छोटा हो गया तो माँ से ज़िद कर उसने उसी स्वेटर को खुलवाया और फिर से बुनने को कहा था..अनुज को यह सब याद है…सब। अनुज को याद है…शबा का बचपन, उसका शुरुआती योवन और वो पिंक स्वेटर जिसके एक एक रेशे के साथ बुनी थी उसकी और शबा की छोटी सी प्रेम कहानी।

 

आज अनुज के आंगन में सलवार सूट पहने, दो चोटी बांधे, तोते जैसी नाक में छोटी सी नथ पहने उछलती कूदती शबा हर समय शैतानी करती हुई नज़र आती है। ठण्ड आ चुकी है पर मैडम को कोई स्वेटर नहीं पहनना। अनुज और नैना की डांट का भी इस पर कोई खास असर नहीं दिखता पर आज अचानक अलमारी से कपड़े निकालते वक्त अनुज और नैना की इस छोटी सी शबा को कोई स्वेटर पसंद आया है..स्वेटर…..वही स्वेटर…जिसमें कहानियां झूलती हैं उन 1 नंबर से 9 नंबर सिलाई वाले कांटों के बीच। कहानियां झांकती हैं उसकी बुनावट से, वो नजाने कितनी सर्द रातों को देख चुकी हैं पर उसकी अलमारी में आज भी धूमिल हो शून्य आंखों से ताकती, टंगी हुई है..वो…प्रेमांजली
पिंक स्वेटर…


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