हाथ गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं: पाश


अवतार सिंह संधू ‘पाश’, जन्मजात विद्रोही। विद्रोह जिनका स्वभाव था, जो उनकी लेखनी में हर जगह दिखा। विद्रोही तेवर और बदलाव की छटपटाहट ने उन्हें क्म्युनिस्ट पार्टी का सदस्य बनाया। विद्रोह को आवाज देने के लिये कवितायें लिखीं जो विद्रोहियों का सामूहिक गान बना। कविताएं पाश के लिये महबूब की जुल्फों तले शाम करने के लिये नहीं थीं और न ही आशिक के पहलू में लिपट कर रात गुजारने का रूमानी एहसास। विद्रोह की बुलन्द आवाज पाश का जन्म 9 सितम्बर 1950 को पंजाब के जालंधर में हुआ था। हिन्दुस्तान में विरोध करना कभी आसान नहीं रहा। सत्ता के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को सरकारों और विरोधियों द्वारा हमेशा से दबाया जाता रहा है। 37 साल की उम्र में खालिस्तानी आतंकवादियों ने “पाश” को मार दिया। कोई किसी की हत्या तभी करता है, जब उसे उस व्यक्ति या उसके विचारों से कोई परेशानी हो। अब भला पाश से किसको समस्या नहीं होती? उनके दुश्मनों को समस्या हुई और उन्हें मार दिया गया। लेकिन पाश ऐसे ही थोड़े मर जाते। सो वह जिन्दा रहे अपनी कविताओं में, अपने विचारों में। आज जब विरोधी विचारों को वामी, कामी और दामी कहकर दबाया जा रहा हो, बोलने वालों को सरेआम सडकों पर मार दिया जा रहा हो, ऐसे में पाश को तो मरना ही था।

उनकी कविताएं अक्सर समाज को झिंझोड़ने वाली होती थीँ।

 

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
लोभ और गद्दारी की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाये पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है
किसी जुगनू की लौ में पढ़ना बुरा तो है
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
पर सबसे ख़तरनाक नहीं होता।
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब कुछ सहन कर लेना
घर से निकलना काम पर और काम से घर लौट जाना
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना…।

 

पाश की कविताएं  एक सपना  हैं जिसे हर हिन्दुस्तानी देखता है। रोटी, कपड़ा और मकान के रूप में, जिसको पूरा करने के लिये वो कमर तोड़ मेहनत करता है। हिन्दुस्तान रोटी, कपड़ा और मकान के लिये स बकुछ करता है, अच्छा या बुरा लेकिन विरोध नहीं करता।

पाश की पहली कविता 1967 में छ्पी और उसी साल वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुये लेकिन कभी हथियार नहीं उठाये। शब्द हथियारों से ज्यादा मारक होते हैं और यही शब्द पाश के हथियार थे। पाश का पहला कविता संग्रह लौह कथा तब प्रकाशित हुआ जब वे जेल में थे। इसी काव्य संग्रह ने पाश को पंजाब और उसके बाहर चमकता लाल सितारा बना दिया, जो अपने बागी तेवरों से सूर्य बना। जेल में ही उन्होंने ढेर सारी कविताएं लिखीं और हस्तलिखित पत्रिका ‘हाक’ का संपादन किया। 1974 में पाश के ‘उड्डदे बाजां मगर’, 1978 में ‘साडे समियां विच’ और 1988 में ‘लड़ांगे साथी’ कविता संकलन छपकर आये। अपने 21 वर्षों की काव्य-यात्रा में पाश ने कविता के पुराने पड़ रहे कई प्रतिमानों को तोड़ा और अपने लिए एक नयी शैली तलाशी।

हम चाहते हैं अपनी हथेली पर कोई इस तरह का सच
जैसे गुड़ की चाशनी में कण होता है
जैसे हुक्के में निकोटिन होती है
जैसे मिलन के समय महबूब के होठों पर
कोई मलाई जैसी चीज होती है।

गुड़ की चाशनी में किसान के पसीने के कण हैं तो हुक्के की निकोटिन में उसकी तमाम चिंताएं हैं जो उसके जिस्म में हुक्के के धुयें के साथ धंसती जाती हैं। पाश ने ही बताया कि हाथ केवल मालिकों के सामने जोड़ने भर के लिये नहीं होते और न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिये होते हैं, हाथ हैं तो इनसे दुश्मन की गर्दन भी तोड़ी जानी चाहिये।

हाथ अगर हों तो
जोड़ने के लिए ही नहीं होते
न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं
यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं
हाथ अगर हों तो
‘हीर’ के हाथों से ‘चूड़ी’ पकड़ने के लिए ही नहीं होते
‘सैदे’ की बारात रोकने के लिए भी होते हैं
‘कैदो’ की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं
हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते
लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं।

 लौह कथा, लोहे का अपना नशा होता है और ये ऐसा नशा है जो कभी उतरता ही नहीं बल्कि बढता ही जाता है। रगों में दौड़ने लगता है खून बनकर। लोहा जिसने सबकी आंखों को चौंधिया दिया है, जिसकी चमक से इसके मालिक को सब तुच्छ दिखाई देता है इन्सान को कीड़ामकोड़ा समझने लगता है। इसके विद्रोह में पाश कहने को मजबूर होते हैं

आप लोहे की चमक में चुंधियाकर
अपनी बेटी को बीवी समझ सकते हैं
लेकिन मैं लोहे की आंख से
दोस्तों के मुखौटे पहने दुश्मन
भी पहचान सकता हूं
क्योंकि मैंने लोहा खाया है
आप लोहे की बात करते हो।

इतने विद्रोहों के बाद, इतनी निराशाओं के बाद भी पाश अपने वतन से प्यार करते हैं। इस मुल्क में उनकी आस्था है, इसको वे अपने से ज्यादा प्यार करते हैं और इस मुल्क से प्यार करते हुए ही वह कहते हैं

भारत
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं

ये पाश की ही कवितायें हैं जो हर टूटी उम्मीद के बाद निराशा में आशा की किरण जगाती हैं और पूरे जोश के साथ कहती हैं कि

हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम से
हम लड़ेंगे साथी गुलाम इच्छाओं से
हम चुनेंगे साथी ज़िंदगी के सपने।।


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