क्या माउंट एवरेस्ट चढ़नेवालों को जिम्मेदारियों का एहसास है?


आए दिन आप अखबारों, वेबसाइट्स और कभी-कभी टीवी पर भी देखते होंगे कि फलां व्यक्ति माउंट एवरेस्ट पर चढ़ा। कुछ लोगों द्वारा माउंट एवरेस्ट चढ़ना केवल दिखावा होता जा रहा है क्योंकि वे इस चढ़ाई के दौरान अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को भूल जाते हैं। पहले चढ़ाई करने वाले अपना ज्यादातर सामान खुद ले जाते थे और साथ चलने वाले शेरपा (सहयोगी) बाकी सामान ले जाने में उनकी मदद करते थे। अब के पर्वतारोहियों में से ज्यादातर खुद कुछ नहीं ले जाते और सारा काम शेरपा के जिम्मे छोड़ देते हैं।

एवरेस्ट चोटी को कर रहे गंदा
सबसे गंदी बात जो है, वह यह है कि ये पर्वतारोही अपने साथ जो सामान ले जाते हैं, उनसे निकलने वाले कचरे को माउंट एवरेस्ट के रास्तों और अन्य जगहों पर छोड़ देते हैं। लगातार हो रही इस हरकत से एवरेस्ट पर इतना कचरा इकट्ठा हो गया है कि उसे ‘बेहद गंदी’ श्रेणी में रखा जाना चाहिए। हैरानी की बात यह है कि लोग वहीं शौच क्रिया भी करते हैं और गंदगी फैलाते हैं। आपको बता दें कि 65 साल पहले जब एवरेस्ट पर पहली बार एडमंड हिलरी और शेरपा तेनजिंग चढ़े थे, तब इतिहास बना था लेकिन अब एवरेस्ट चढ़ना आम बात हो गया है। इस साल भी 600 से ज्यादा लोग एवरेस्ट चढ़ चुके हैं।

आसानी से चढ़ते हैं आज के पर्वतारोही
प्राइवेट कंपनियों के सीएसआर फंड, सरकारी फंड पर लोग एवरेस्ट चढ़ने जाते हैं। शेरपाओं की भरपूर मदद मिलती है, तमाम संसाधन होते हैं लेकिन बेसिक काम करना ये लोग जरूरी नहीं समझते। इस तरह की हरकतों से परेशान होकर नेपाल सरकार ने ‘रबिश डिपॉजिट स्कीम’ शुरू की, इसके तहत हर पर्वतारोही टीम को चढ़ाई से पहले 4000 डॉलर जमा करने होते हैं। अगर हर पर्वतारोही कम से कम 8 किलोग्राम कचरा लेकर उतरता है तो ये पैसे वापस कर दिए जाते हैं।

यहां भी घूसखोरी और दलाली
सागरमाथा पॉल्यूशन कंट्रोल कमिटी (एसपीसीसी) के आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में ही पर्वतारोही लगभग 25 टन कचरा और 15 टन मलमूत्र और ह्यूमन वेस्ट लेकर नीचे आए। हालांकि, इतना कचरा कुल कचरे का मामूली हिस्सा ही है। 18 बार एवरेस्ट चढ़ चुके पेंबा दोरजे शेरपा बताते हैं कि अधिकारियों की लापरवाही और घूसखोरी के चलते लोग बिना कचरा लाए भी अपना डिपॉजिट वापस पा लेते हैं।

यही गंदगी बारिश में समुद्र में पहुंच जाती है
इसके अलावा बेस कैंप की हालत यह है कि वहां के कचरे को बगल के एक गांव की घाटियों में ले जाकर डाल दिया जाता है। यही कचरा बारिश के बाद बहकर समुद्र में पहुंचता है। अब आलम यह है कि हम जिन्हें देखकर खुश होते हैं, वे अपनी लापरवाही से इस खूबसूरत चोटी को गंदा कर रहे हैं। जरूरत है कि इसके लिए पर्वतारोही खुद थोड़ी सी मेहनत करें और इस दिशा में भी काम करके नाम कमाएं।

सोर्स: यह खबर द हिंदू अखबार से अनुवाद के आधार पर लिखी गई है। खबर को द हिंदू की वेबसाइट पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

 


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