गांधी की नजरों में सबसे बड़े भिक्षुक क्यों थे मदन मोहन मालवीय?


विश्वविद्याल की नींव डालने की तैयारी चल रही थी। तत्कालीन भारत में महामना कहे जाने वाले शिक्षाविद, वकील, नेता, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. मदन मोहन मालवीय विश्वविद्यालय स्थापना के लिए चंदे की व्यवस्था कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने हर उचित उपाय से धन एकत्रीकरण का अभियान थाम रखा था। इसी क्रम में मालवीय जी एक नवाब के पास पहुंचे और उनसे कम से कम दो लाख चंदा देने का आग्रह किया। नवाब ने दो लाख की राशि को दस रूपए तक गिराया। मालवीय तब भी तैयार थे और जाने से पहले उन्होंने नवाब से अंतिम फैसला लेकर उपयुक्त धनराशि देने के लिए कहते हुए अपना दुपट्टा आगे कर दिया। नवाब को जाने क्या सूझी कि उसने दुपट्टे में अपना जूता डाल दिया। हो सकता है उसका यह कृत्य महामना के अपमान के लिए हो लेकिन सम्मान-अपमान से परे हो चुके मदन मोहन मालवीय कहां इसे अपमान मान सकते थे। उन्होंने नवाब की ओर से जूते को ही चंदा मानकर वहीं से विदाई ले ली। अगले दिन मालवीय जी ने अखबारों में विज्ञापन दे दिया कि फलां रियसत के के नवाब ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के लिए अपना जूता चंदे में दिया है, जिसको फलां तिथि को फलां जगह पर नीलाम किया जाएगा। जो भी उसे क्रय करने का इच्छुक हो वह नीलामी में शामिल हो जाए। खबर नवाब तक भी पहुंची। उसे इस बात से बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई और उसनें तुरंत मालवीय जी को बुलाकर उन्हें यथोचित सहयोग राशि प्रदान किया।

 

स्कूल के दिनों में हमारे एक गुरूजी महामना से जुड़ा एक और संस्मरण सुनाया करते थे। विश्वविद्यालय के लिए धन एकत्रित करने ही के उद्देश्य से महामना एक व्यापारी के यहां जाते हैं। आलीशान बंगले में पहुंचते ही महामना देखते हैं कि व्यापारी अपने एक नौकर को बुरी तरह से डांट रहा था। महामना ने उससे अपने नौकर को डांटने का कारण पूछा तो उसने कहा कि मालवीय जी, आज इस मूर्ख ने बिना किसी जरूरत के एक माचिस की तीली जलाई है और इसीलिए इसे सबक सिखाना जरूरी है। महामना उल्टे कदम वापस जाने लगे। उन्हें लगा कि माचिस की एक तीली के लिए जो आदमी अपने नौकर लगभग पीटने की हद तक डांट सकता है वह चंदा क्या देगा? व्यापारी ने लौटते महामना को रोक लिया और उनके आने का प्रयोजन पूछा। महामना कुछ न बोले और जाने लगे। व्यापारी के जिद करने पर उन्होंने अपने आने का उद्देश्य स्पष्ट किया। इस पर उस व्यापारी ने उन्हें तुरंत रोककर तब की सबसे ज्यादा राशि चंदे के रूप में दे दी। जो सवाल हमारा है वही आश्चर्यचकित महामना का भी था कि आखिर इस कंजूस ने इतना दान कैसे दे दिया? महामना ने कहा कि आपने माचिस की एक तिल्ली के नुकसान होने पर अपने नौकर को इतना डांटा तो मैने सोचा कि आप कंजूस हैं और कुछ नहीं देंगे लेकिन आपने इतना सारा दान दे दिया? इस पर व्यापारी बोला कि पंडित जी, नौकर को तो मैं इसलिए डांट रहा था कि उसने निरर्थक माचिस की एक तीली बेकार की है और छोटी से छोटी चीज का भी दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। आप तो शिक्षा का महान उद्देश्य पाले बैठे हैं। धरती पर धन का इससे अच्छा सदुपयोग और क्या होगा!

 

मालवीय को महामना उपनाम देने वालों में से एक महात्मा गांधी उन्हें संसार का सबसे बड़ा भिक्षुक मानते थे। महात्मा ने अपने एक उद्बोधन में कहा था कि मालवीय अपने लिए नहीं बल्कि जो काम थाम लेते थे उसके लिए भिक्षा मांगने तक से संकोच नहीं करते थे। विश्वविद्यालय के लिए उन्होंने एक करोड़ रूपए इकट्ठे करने की प्रतिज्ञा की थी जबकि उन्होंने इससे आगे बढ़कर तकरीबन डेढ़ करोड़ दस लाख रूपए इकट्ठा कर लिए थे। विश्वविद्यालय स्थापना के लिए महामना ने धनराशि एकत्र करने के लिए हर किसी से सहयोग लिया। महामना के प्रभावशाली उद्बोधन से प्रेरित होकर तमाम महिलाओं ने अपने स्वर्णाभूषण तक उन्हें सौंप दिए थे। इतना ही नहीं शवों पर फेंके हुए पैसे तक एकत्रित करने की घटना महामना के जीवनग्रंथ से सुनने को मिलती है। हैदराबाद के एक निजाम के यहां जब महामना चंदा मागंने के लिए पहुंचे तब उसने उन्हें यह कहते हुए कुछ भी देने से मना कर दिया कि एक हिंदू विश्वविद्यालय के लिए वह कभी चंदा नहीं देगा। महामना किसी भी द्वार से खाली हाथ नहीं लौटे थे। यहां से भी वह खाली हाथ नहीं जाना चाहते थे। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का ही यह परिणाम था कि उस निजाम से भी उन्होंने काफी धनराशि दान के रूप में ले ही ली। यह सब कैसे हुआ? दरअसल निजाम के मना करने पर महामना चिंतित अवस्था में लौटने लगे। रास्ते में उन्हें एक शवयात्रा दिखाई पड़ी। शवयात्रा में शव पर पैसे लुटाए जा रहे थे। अचानक महामना ने शव पर लुटाए जा रहे पैसों को बटोरना शुरू कर दिया। एक राष्ट्रीय नेता को ऐसा करते देख कुछ लोगों ने मालवीय जी से कहा कि महाराज! आप इस देश के इतने प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आपको ऐसा करना शोभा नहीं देता। आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? इस पर महामना बोले – ” मैं ऐसा नहीं बिल्कुल नहीं करता, लेकिन मैं बनारस जाकर क्या जवाब दूंगा कि हैदराबाद से खाली हाथ क्यों लौट आया? शव पर लुटाए जा रहे इस पैसे को हैदराबाद के नाम से जमा कर दूंगा।”


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