अखबार फेंककर इस बॉलर के हाथ ऐसे हो गए कि तेज गेंद से होश उड़ा देता है


राजस्थान के धौलपुर में मशर्रत खान-मीना खान अपने तीन बच्चों के साथ जीवन जीने की जद्दोजहद कर रहे थे। उनके इस संघर्ष में उनका साथ उनकी तीन औलादें भी दे रही थीं। मशर्रत खान अपना और परिवार का पेट पालने के लिए पूर्व में ड्राइवर और कुछ दिनों बाद दर्जी का काम कर रहे थे।

उनकी सबसे छोटी औलाद, जिसका नाम उन्होंने तनवीर मशर्रत उल हक रखा था और तनवीर का मतलब शरीर से बहादुर और मजबूत होता है। कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दिखने शुरू हो जाते हैं। शायद इसीलिए मशर्रत ने अपनी औलाद को तनवीर नाम दिया। तनवीर ने अपने नाम की सार्थकता को आगे सिद्ध भी किया। हालांकि, उनका ये सफ़र किसी शहजादे की जिंदगी सा सुहावना न होकर, कांटों की राह पर चलकर ख़ुद को ज़िंदगी की बगिया में गुलाब के मानिंद महकाने वाले नायक सा है।

मजबूरी में बल्लेबाजी छोड़ शुरू की गेंदबाजी

बाल तनवीर की चाहत क्रिकेट का ऐसा मुसौवर बनने की थी, जो अपने बल्लेबाजी के रंग से क्रिकेट पिच के कैनवास पर स्वयं को मूर्तचित्र सा गढ़ दे। कहते हैं न कि सपने देखना आपके वश में है, मग़र उनकी पूर्ति मने परिणाम आपके हाथों में नहीं होता है। क्रिकेट को ही अपना मजहब मान बैठने वाले तनवीर के पास इतने पैसे भी न थे कि वह एक बैट खरीद सकें।

ऐसे में उसने अपने जुनून को पाने के लिए अख़बार बेचना शुरू कर दिया, जब इतने पर भी बात न बनी तो कार मैकेनिक का काम करने लगे। चूंकि क्रिकेट में बल्लेबाजों के लिये जब-तब क्रिकेट किट की डिमांड बनी ही रहती है। ऐसे में बल्लेबाज़ी का चितेरा अपने हाथ मे गेंद थाम लेता है ताकि अपने जुनून क्रिकेट को वह जीता रहे।

इस बीच उसकी मुलाकात राजस्थान क्रिकेट संघ के कोच सुमेंदर तिवारी से होती है। तिवारी साहब, बालक तनवीर की गेंदबाज़ी से बहुत प्रभावित होते है। उन्हें उसी समय ये यकीं हो जाता है कि गुमनामी में जी रहा ये तारा एक दिन कामयाबी के फ़लक पर जरूर अपनी चमक को बिखेरेगा। तिवारी जी के गाइडेंस में तनवीर गेंदबाजी करना शुरू कर देता है।

आईपीएल में सिलेक्शन नहीं हुआ तो क्रिकेट छोड़ने का मन बना लिया

इस बीच मुम्बई इंडियंस के लिए वर्ष 2013 में वो ट्रॉयल देता है मग़र उसका चयन नहीं हो पाता है। चयन न होने से क्षुब्ध तनवीर क्रिकेट को अलविदा कहने की सोच लेता है मग़र कोच तिवारी जी उन्हें समझाते हैं और कहते हैं कि ये तो सफ़र में एक पड़ाव मात्र है, मंजिल अभी बाक़ी है मेरे बच्चे। अगले वर्ष यानी 2014 में वो राजस्थान की रणजी टीम के लिए ट्रायल देते हैं और उनका चयन हो जाता है।

चयन के बाद वो लगातार खुद को साबित करते रहते हैं लेकिन वर्ष 2018-19 में अपने परिष्कृत रूप में वो निखर कर सबके सामने आते हैं। जिमी एंडरसन को अपना आदर्श मानने वाला ये गेंदबाज़ वर्ष 2018-19 के रणजी सीजन के 10 मैचों में 51 विकेट लेता है और उसका ये रेकॉर्ड एक गेंदबाज के तौर पर राजस्थान की रणजी टीम के लिए अभूतपूर्व हो जाता है।

कहते हैं कि एक सफल आदमी की कामयाबी में उसके द्वारा अर्जित किए गए संस्कारों की महती भूमिका रहती है। तनवीर के मुआमले में भी ये प्रमुख रोल अदा करती है। तनवीर की माँ मीना खान की ख़्वाहिश है कि उनका दुलारा बेटा पाकिस्तान के खिलाफ़ खेले और अपनी गेंदों से पाकिस्तानी बल्लेबाजों के किले को नेस्तनाबूद कर दे।

लेट स्विंग ऐसी की अच्छे-अच्छों के होश उड़ गए हैं

राजस्थान की गेंदबाज़ी के इस कोहिनूर का प्रमुख हथियार लेट स्विंग है। अब जबकि क्रिकेट जगत भी आईटी क्रांति से आई तकनीकियों से अछूता न है और वहां पर बल्लेबाज, गेंदबाज़ की एक-एक गतिविधि को पढ़ता-देखता है। ऐसे में तनवीर की सफलता तमाम लोगों को चकित करती है। उनको असाधारण सीम मिलती है, जिसे पढ़ने में बल्लेबाज चूक जाता है और अपना विकेट गंवा देता है। तनवीर की गेंदें जादूगरों के नज़र चुराने के खेल सरीखी हैं। उनकी लेट स्विंग के फ़ेर में क्रिकेट जगत के तमाम दिग्गज करुण नायर, मनीष पांडे आदि भी फंसे हैं।

उनके द्वारा अर्जित की गई इन्हीं कामयाबियों के बाबत धौलपुर की जनता उन्हें मंजिल नाम से बुलाती है। गेंदबाज़ी करने के लिए उनके पिच पर उतरते ही मंज़िल नाम की ध्वनि से पूरा स्टेडियम गुंजायमान हो जाता है। अभी तनवीर अपने अचूक हथियार मिस्ट्री बॉल पर खूब काम कर रहे हैं, जिसका खुलासा उन्होंने अभी न किया है। उनका अभी प्रमुख और एकमात्र उद्देश्य देश के लिए टी 20 खेलना है। टी 20 में हम शायद उनकी इस मिस्ट्री बॉल से रूबरू हो पाएं।


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