कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कहीं पार्टी को खत्म न कर दे


कांग्रेस बीते 6 सालों से अपना वजूद बचाए रखने की कवायद में है. पार्टी में विघटन, नेताओं में कलह, गुटबाजी, पार्टी से पलायन जैसी तमाम समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बेसुध पड़ा है.

हरियाणा और महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों के नामों का ऐलान कर दिया है. तमाम गतिरोधों के बावजूद पार्टी नेता चुनाव प्रचार मोड में आ गए है और कांग्रेस के नेता कलह मोड में.

हरियाणा के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व पर उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के वफादार नेताओं को पार्टी में साइडलाइन किया जा रहा है. राहुल और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी पर कुछ बोलने से इनकार करते हुए कहा कि पार्टी की व्यवस्था में काफी कमियां हैं. मेरा गुस्सा कांग्रेस के लोगों से है, पार्टी की विचारधारा से नहीं.

टूट रही है पार्टी

हरियाणा कांग्रेस में कांग्रेस दरअसल नेताओं की अनबन से जूझ रही है. पूरे देश जितना कांग्रेसी नेताओं का आकाल हरियाणा में भी हैं. कुमारी शैलजा, भुपेंद्र हुड्डा के भरोसे चल रही हरियाणा कांग्रेस…..दरअसल नेतृत्व हीन है.

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अब महाराष्ट्र की ओर चलते हैं. टिकट बंटवारे पर खूब घमासान यहां भी मचा है. मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रहे संजय निरुपम ने स्पष्ट तौर पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सवालों के घेरे में खड़ा किया है. अशोक चव्हाण और संजय निरुपम की अनबन जगजाहिर है.

अशोक चव्हाण ने संजय निरुपम के पार्टी में गुटबाजी के आरोप पर कहा कि यह उनकी निजी राय हो सकती है. चव्हाण ने कहा, ‘जब तक वो पार्टी में मजबूती के साथ थे, वो अच्छा बोल रहे थे. लेकिन जब बात नहीं बनी तो वो आलोचना कर रहे हैं.’

संजय निरुपम ने हाल ही में कहा था कि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को अपने दरबारियों से मुक्ति पानी चाहिए. आरोप था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया एक बार भी महाराष्ट्र नहीं आए हैं और अपने दोस्तों से बातचीत के आधार पर टिकट बांट दिए हैं. उन्होंने ये भी कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे लोग बेकार हैं, पार्टी चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है.

जब इस तरह से लोग विरोद खुलकर जता रहे हों तो चुनाव का राम भरोसे होना तय ही है.

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किसका है जनाधार?

पार्टी आलाकमान सोनिाया गांधी अब सच में एक्टिव पॉलिटिक्स से दूर हो चुकी हैं. पकड़ ढीली हो रही है. 2019 के लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने ढंग से कैंपेनिंग नहीं की. पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भोले मोड में हैं. इन दिनों जैसा लगता है कि भांग पार्टी में सामूहिक बांट दी गई हो. मस्त होकर स्ट्रेस रिलीज करने कंबोडिया गए हैं. पहले दावा किया जा रहा था कि बैंकॉक जा रहे हैं.

जहां भी जा रहे हैं, कांग्रेस को राहुल गांधी बहुत मंझधार में छोड़कर जा रहे हैं. प्रियंका गांधी को पार्टी की कमान मिली नहीं है, सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं. पूर्व अध्यक्ष फॉरेन ट्रिप पर हैं. चुनाव सिर पर है. चिदंबरम जी जेल में हैं. गुलाम नबी आजाद कश्मीर बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. चुनावी मौसम में कश्मीर की बाद करना भी खतरे से खाली है, वोटर कब फ्लोटिंग वोटर बन जाए कहा नहीं जा सकता.

मल्लिकार्जुन खडगे डिफेंसिव मोड में हैं, लेकिन उन्हें जानता कौन है. शशि थरुर बोलें तो उनकी भाषा समझाने के लिए ब्रिटेन से 10 आदमी ढूंढ कर लाना पड़ जाए. ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट कर क्या रहे हैं भगवान भी नहीं कमलनाथ प्रचार करने से दूर हैं, अशोक गहलोत राजस्थान के खेमे को संभाल रहे हैं. भूपेश बघेल किस काम हैं, उन्हें जानता कौन है.
जानते.

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एक परिवार बनाम BJP-RSS

कुलमिलाकर एक तरफ अकेले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हैं जिनसे कांग्रेस की पहचान हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा, योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी मनोहर लाल खट्टर, लाख सिरों वाला राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है. कांग्रेस एक परिवार से बाहर नहीं निकल पा रही है, बीजेपी पूरे मोहल्ले में फैल गई है.

खासियत बीजेपी की यह है कि सारे नेता एकसुर में साथ बोलते हैं. कांग्रेस में सबके अलग-अलग खुदा हैं.

21 अक्टूबर को होने जा रहे मतदान से पहले महाराष्ट्र व हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी सार्वजनिक मंचों से सामने आ रही है. हैरान करने वाली बात ये है कि कांग्रेस से बगावत करने वाले नेता सीधे तौर पर कांग्रेस हाईकमान को निशाने पर ले रहे हैं और उन पर सवाल उठा रहे हैं. राहुल गांधी मस्त हैं. किसी दिन राफेल, मॉब लिंचिंद, आरएसएस पर बोलकर अंतर्ध्यान हो जाएंगे. कभी-कभी लगता है कि तेज प्रताप यादव और राहुल गांधी सेम कैटेगरी के वीर हैं. जय भोले के भक्त.

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