बुक रिव्यू: किरदारों को वेश्या बताती किताब ‘वेश्या: एक किरदार’


रिश्तों को एक-एक करके खोते जाना उस वेश्या की तरह एहसास करता है, जो लाख चाहकर भी उसी दुनिया में रहती है, जिसमें वह नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। जिंदगी में ऐसे एहसास लाने वाले किरदारों को ही हिमांशु तिवारी ने ‘वेश्या’ बताया है। छोटी-छोटी कहानियों को पढ़ते-पढ़ते कई बार जिंदगी का आईना आपके अंदर की ‘वेश्या’ को सामने लाकर वह सच दिखाता है जो आप जानते तो हैं लेकिन कभी उसका सामना नहीं करना चाहते।

किताब: वेश्या: एक किरदार
लेखक: हिमांशु तिवारी ‘आत्मीय’
मूल्य: 100 रुपये
प्रकाशक: हिंद युग्म प्रकाशन

बीस कहानियों में ऐसे-ऐसे किरदार सामने आते हैं कि लगता है यह कोई किताब नहीं बल्कि किसी डायरी के पन्ने हैं, जिन्हें किताब की शक्ल दे दी गई हो। ज्यादातर कहानियों में हैपी एंडिंग की बजाय जब किसी ना किसी की मौत हो जाती है तो लेखक की मानसिकता के बारे में शक होने लगता है लेकिन किसी लाइन में बता दिया जाता है कि मौत ही आखिरी सच है।

20 कहानियों में गांव-शहर, जवानी-इश्क, परिवार-रिश्तेदार, जिंदगी-करियर और गम-आंसू को लपेटने में थोड़ा उतावलापन जरूर दिखता है। कई कहानियों में नाटकीयता पर सच इतना ज्यादा हावी हो जाता है कि किताब पढ़ने वाले को लगता है कि ऐसा लिखने की क्या जरूरत थी! किरदारों को वेश्या बताने के पीछे दिए गए तर्क और इसी के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियां वाकई भावुक करती हैं। कई बार आंखों में आंसू भी आते हैं लेकिन फिर लगता है कि सच ही तो है जो भी है। ‘नौसिखिए’ लेखक की किताब पढ़ने से पहले थोड़ा संकोच जरूर था लेकिन कहानियों की सच्चाई और कहने का अंदाज उस संकोच को सर्द हवाओं संग ही उड़ जाने को कह देती हैं।

भाषाई आधार पर लेखक को सुधार करने की जरूरत है, इसी से कहानियों को थोड़ा और मजबूत, बड़ा और याद करने वाला बनाया जा सकता है। जब शब्दों से कहानियां सामने विजुअल इमेज क्रिएट करने लगेंगी तो लंबे समय तक याद रहेंगी। कहानियों को फर्स्ट पर्सन में लिखा गया है, इसलिए कई बार कन्फ्यूजन होता है कि हम किसे विजुअलाइज करें! किरदारों को कई बार नाम ना दिए जाने से भी कहानियां लंबे समय तक याद नहीं रहेंगी।


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