बुक रिव्यू: ‘डार्क नाइट’ ‘काम’ ‘माया’ और ‘सौंदर्य’ में उलझती जिंदगी


प्रिया और माया के आकर्षण में डोलता कबीर, उस दोराहे के जंक्शन पर पहुंचता है, जहां उसकी पुरानी कल्पनाएं जीवित होना चाहती हैं। किसके प्रेम में ढलेंगी कबीर की कल्पनाएं?

किसकी दहलीज पर जाकर रुकेगा कबीर के ख्वाबों का कारवां?

माया या प्रिया?


किताब का नाम: डार्क नाइट

लेखक: संदीप नैयर

प्रथम संस्करण: जनवरी 2018

मूल्य: 175(MRP)


डार्क नाइट क्या है,  यह डार्क नाइट से होकर गुजर चुका शख्स ही समझ सकता है। किताब पढ़ने वाले कुछ लोग खुद को इसकी कहानियों से, कुछ अवसाद से, कुछ ‘काम’ से, कुछ इसमें छिपे प्यार से तो कुछ ऐम्बिशन से जरूर जोड़ पाएंगे। अक्सर यूपी, बिहार और दिल्ली की पृष्ठभूमि पर लिखी गई किताबें ही हाथ लगती हैं। पहली बार एक हिंदी किताब के जरिए लंदन से परिचय हुआ। शुरुआत में कई बार यह सवाल भी मन में आता है कि इस किताब को हिंदी की बजाय अंग्रेजी में लिखा जाना चाहिए था। खैर, आखिर तक लेखक ने अपनी कहानी के जरिए राजी कर लिया कि, नहीं इसे और इस जैसी कहानियों को हिंदी में ही लिखा जाना जरूरी है।

 

प्रेम, रोमांस, सेक्स, अवसाद, आवारापन, ऐम्बिशन, सौंदर्य और कहानी को एक किताब रूपी माला में अच्छे से पिरोया गया है। कहीं-कहीं ऐसा लगता है कि कभी लंदन ना गए लोग किताब से जुड़ने में दिक्कत जरूर महसूस करेंगे लेकिन कहानी की भारतीयता और किरदारों का लंदनवासी होने के बाद भी देसी होना आपको परेशानी से बचा लेता है।

 

आजकल लिखी जा रही टिपिकल कहानियों जैसे कि ‘प्यार सिर्फ एक बार होता है’, ‘प्यार में बदला’, ‘प्यार में आईएएस बन जाना’ से काफी अलग सच्चाई के काफी करीब की कहानी है। हां, कहानी भारतीय है इसलिए पहली नजर का प्यार तो लाजिमी है ही। कहानी में बार-बार सेक्स का जिक्र आना एक दो बार जरूर उबाऊ लगने लगता है। हालांकि, कहानी पर पकड़ इतनी मजबूत है कि आप किताब खत्म करके प्रिया, कबीर और माया को ढूंढने लगें।

 

कहानी में लेखक ने भारतीय पुरुषों और महिलाओं की फैंटसियों को बड़ी चतुराई से फिट कर दिया है। फैंटसियां सेक्स से रिलेटेड हैं लेकिन कभी बोझिल नहीं लगती हैं। एक-दो बार ऐसा भी लगता है कि कहीं आप मस्तराम तो नहीं पढ़ रहे हैं।

 

लंदन की कहानी एक बार भी भारत नहीं आ पाती यह बात बहुत अखरती है लेकिन लेखक ने इस बात का रिस्क लिया है इसलिए उनकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए।

 

माया और काम कहानी के किरदार से इतर जब आपके मन में समाज में प्रचलित ‘काम’ और ‘माया’ की छवि पेश करने लगते हैं तब लगता है कि सच में यही माया है। काम पुरुष को माया से दूर जाने की नहीं बल्कि सौदर्य में डूबने की सलाह देता है।

 

मनुष्य की मुक्ति, जीवन के सौंदर्य को समझने में है, जीवन के सौंदर्य के जीने में है....आखिर सौंदर्य है क्या? और सौंदर्य के प्रति पूरी तरह से जागृत होना ही सत्य है।

 

किताब केवल एक कहानी भर तो कतई नहीं है। कुछ को सौदर्य को समझा देने में सक्षम है तो कुछ के पुराने जख्म भी जरूर कुरेदगी।

 

लेखक ने जॉन कीट्स की जिन लाइन्स को किताब की भूमिका की शुरुआत में इस्तेमाल किया है, वे अगर किताब खत्म करके एक बार फिर से दोहरा ली जाएं तो फटाफट पूरी कहानी आंखों के सामने यूं तैर जाती है जैसे- पहाड़ों पर तेजी से बादल तैरते होंगे।

कीट्स ने लिखा है:

ब्यूटी इज ट्रुथ, ट्रुथ इज ब्यूटी

दैट इज ऑल यू नो ऑन अर्थ

ऐंड ऑल यू नीड टू नो...


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