‘मेरे पास मां है’- सिनेमा जब तक रहेगा, ये शब्द गूंजते रहेंगे


साल 1951, फिल्म थी आवारा, राज कपूर के बचपन का रोल निभाते हुए एक छोटा सा बच्चा स्कूल मास्टर से कहता है, ‘मास्टर साहब ये ब्रश है और ये पॉलिश है, मैं बहुत अच्छा बूट पॉलिश करता हूं’ उसी फिल्म में वो एक रोटी के लिए दर-दर की ठोकरें खाता है और अंत में रोटी उसे जेल में ही मिलती है. और जब उसे रोटी मिलती है तो हंसते-खिलखिलाते हुए शशि कपूर कब गायब होकर बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता.

‘मेरे पास मां है’

साल 1975, वह दौर जब राजेश खन्ना नाम के धूमकेतु की रोशनी धूमिल होकर महानायक अमिताभ बच्चन के रूप में शक्ल ले रही थी, उसी साल एक फिल्म आई दीवार, जिसमें अमिताभ बच्चन को मिले एक जवाब ने सिने प्रेमियों को रोंगटे खड़ा कर देने के लिए मजबूर कर दिया. और वह जवाब आज भी जब सिनेमाई परदे पर सुना जाता है तो दर्शकों की प्रतिक्रिया वही रहती है, जो 1975 में सुनने के बाद पहली बार आई थी. वह जवाब था, ‘मेरे पास मां है’

शशि कपूर नहीं रहे. लेकिन अपने जीवन में उन्होंने जो किया वो इतिहास में प्रेरणा बन गया. भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े कपूर खानदान से होने के बावजूद उन्होंने फिल्मों में ऐसी छाप छोड़ी जिसकी भरपाई कोई और नहीं कर सकता था. अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थियेटर्स से एक्टिंग की शुरुआत करके शशि कपूर ने गैर परम्परागत किस्म की भूमिकाओं के साथ सिनेमा में आगाज किया था.

साल 1965 में उनकी पहली जुबली फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ रिलीज हुई. इस फिल्म ने उन्हें भारतीय सिनेमा में स्थापित कर दिया था.

शशि कपूर हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने हाउसहोल्डर और ‘शेक्सपियर वाला’ जैसी अंग्रेजी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं थीं. साल 1965 में उनकी पहली जुबली फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ रिलीज हुई. इस फिल्म ने उन्हें भारतीय सिनेमा में स्थापित कर दिया था. वर्ष 1972 में फिल्म सिथार्थ के साथ उन्होंने अन्तराष्ट्रीय सिनेमा के मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.

अमिताभ बच्चन के साथ आई उनकी फिल्मों को दर्शकों ने खूब पसंद किया. जिनमें दीवार कभी- कभी, त्रिशूल, सिलसिला, नमक हलाल, दो और दो पांच और शान जैसी फ़िल्में शामिल हैं.

1971 में पिता पृथ्वीराज कपूर की मृत्यु के बाद शशि कपूर ने पत्नी जेनिफर के साथ मिलकर पृथ्वी थियेटर्स का पुनरूथान किया.
116 से भी ज्यादा फिल्मों में काम करने के बाद शशि कपूर को भारत सरकार ने 2011 में पद्म भूषण से नवाजा और 2015 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया.


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