जन्मदिन विशेष: भारत के पहले राष्ट्रपति जिन्हें नेहरु ने कभी राष्ट्रपति नहीं समझा


भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का वह दौर जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफत का दूसरा नाम महात्मा गांधी था, उस दौर में अपने-अपने क्षेत्र के बहुत से प्रतिष्ठित लोगों ने महात्मा गांधी के नाम पर अपने नौकरी पेशे को त्यागकर आन्दोलन की मुख्य धारा में खुद को झोंक दिया था. डॉ राजेंद्र प्रसाद उसी में से एक थे.

अंग्रेजी हुकूमत जब नील की खेती के नाम पर बिहार के लोगों पर कहर बरपा रही थी तो 1917 में गांधी जी बिहार कूच कर चुके थे. दरअसल, अंग्रेजी सरकार लोगों से काम तो खूब करवाती थी, लेकिन बदले में उन्हें मेहनताना देने में आनाकानी करती थी.

1917  में गांधी जी के बिहार प्रवास के दौरान ही राजेन्द्र प्रसाद आन्दोलन की मुख्य धारा में आए थे. और चंपारण आन्दोलन तक महात्मा गांधी के वफादार साथी बन गए. इसके बाद 1934 में राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस के बम्बई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए.

1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में गिरफ्तार होकर जेल गए. इससे पहले 1931 में नमक सत्याग्रह में भी गांधी के मुख्य सहायक होने की वजह से ब्रिटिश सरकार ने राजेंद्र प्रसाद को जेल भेजा था.

नेहरु से टकराव की शुरुआत

जुलाई 1946 में जब संविधान सभा को भारतीय संविधान के गठन की जिम्मेदारी दी गई तो राजेंद्र प्रसाद को इसका अध्यक्ष चुना गया. 1950 जब स्वतंत्र भारत का गणतंत्र बना तो राजेंद्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति चुने गए. हालाकि जवाहरलाल नेहरु चाहते थे कि राजगोपालाचारी को देश के पहले राष्ट्रपति बनें और इसके लिए नेहरु ने अपनी तरफ से कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, किन्तु महात्मा गांधी और सरदार पटेल के प्रिय होने के नाते राजेंद्र बाबू ही राष्ट्रपति बने.

 

 

हिंदू कोड बिल पर टकराव

इससे पहले 1947 में नेहरु और प्रसाद के बीच एक बार टकराव हो चुका था. दरअसल, अक्टूबर 1947 संविधान सभा में जब आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल का मसौदा पेश किया, जिसके अनुसार सभी हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी तो नेहरु ने इस बिल का समर्थन किया. लेकिन संविधान सभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने यह कहते हुए इस बिल का विरोध किया कि ऐसे नियमों पर पूरे देश में जनमत होना चाहिए. उसके बाद ही ये कानून बनाया जाना चाहिए. उनका तर्क था कि परम्पराएं देश में कई रूप में प्रचलित हैं. इसलिए सबको साथ लेकर चलना जरूरी है.

नेहरु ने हिंदू कोड बिल को पास कराने को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया. और राजेंद्र प्रसाद से टकराव की स्थिति बन गई. इस पर राजेंद्र प्रसाद ने नेहरु को पत्र लिखकर उन्हें अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि वो खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में हैं, अतः उनकी भी बात सुनी जाए. और उन्होंने इस पत्र को सरदार पटेल को भी दिखाया. सरदार पटेल ने राजेंद्र प्रसाद से शांत रहने को कहा और कहा कि कि इस मुद्दे को सही समय पर उठाया जाएगा. दरअसल, सरदार पटेल जानते थे कि अभी संविधान पूरा होने वाला है और उसके तुरंत बाद राष्ट्रपति चुनाव होने हैं, और वो राष्ट्रपति के तौर पर राजेंद्र प्रसाद को ही देखना चाहते थे, इसलिए वो चुनाव से पहले नेहरु से टकराव नहीं चाहते थे.

 

चिट्ठी के जरिए राष्ट्रपति बनने से रोकना चाहा

उधर नेहरु राष्ट्रपति के लिए राजगोपालचारी को निर्वाचित कराना चाहते थे. पूर्व इंटेलिजेंस अफसर रहे आरएनपी सिंह ने अपनी किताब ‘नेहरू-ए ट्रबल्ड लेगेसी’ में इस बात का जिक्र भी किया है. सितम्बर 1949 में नेहरु ने राजेंद्र प्रसाद को चिट्ठी लिखी कि उनकी सरदार से इस बारे में सहमति बनी है कि राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाया जाएगा. इस बात का जिक्र राजेंद्र प्रसाद ने जब सरदार पटेल से किया तो सरदार पटेल ने नेहरु के साथ हुई ऐसी किसी भी चर्चा को सिरे से नकार दिया.

26 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने. राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनके और जवाहरलाल नेहरु के बीच वैचारिक प्रतिद्वंदिता बनी रही. दरअसल नेहरू पश्चिमी संस्कृति के बड़े समर्थक थे. उनके विचार उस समय के अनुसार काफी खुले थे. वो राजनीति में किसी भी धर्म के हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ थे. और राजेंद्र प्रसाद परंपरावादी हिंदू थे. वो खूब धार्मिक थे.

पूर्व इंटेलिजेंस अफसर रहे आरएनपी सिंह ने अपनी किताब 'नेहरू-ए ट्रबल्ड लेगेसी' में इस बात का जिक्र भी किया है. सितम्बर 1949 में नेहरु ने राजेंद्र प्रसाद को चिट्ठी लिखी कि उनकी सरदार से इस बारे में सहमति बनी है कि राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाया जाएगा. इस बात का जिक्र राजेंद्र प्रसाद ने जब सरदार पटेल से किया तो सरदार पटेल ने नेहरु के साथ हुई ऐसी किसी भी चर्चा को सिरे से नकार दिया.

 

सोमनाथ मंदिर के उदघाटन पर टकराव

1951 में प्रधानमंत्री नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का उदघाटन नहीं करने का आग्रह किया था. उनका तर्क था कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए. हालांकि राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में जाकर शिव मूर्ति की स्थापना की. डा. राजेन्द्र प्रसाद धार्मिक थे ही, किन्तु उनका यह भी मानना था कि, सभी धर्मों के प्रति बराबर सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए. सोमनाथ मंदिर के उदघाटन के वक्त डा. राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन नास्तिक राष्ट्र नहीं है.

 

तिब्बतचीन नीति पर नेहरु से थी असहमति

राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी-चीनी भाई-भाई की नीति से घोर असहमत थे. राजेन्द्र प्रसाद और नेहरु में राज्यभाषा हिन्दी को लेकर भी मतभेद था. 1961 में मुख्यमंत्रियों की सभा को राष्ट्रपति ने लिखित सुझाव भेजा कि अगर भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लें, जैसे यूरोप की सभी भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती हैं, तो भारत की राष्ट्रीयता मजबूत होगी. सभी मुख्यमंत्रियों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लिया, किन्तु केंद्र सरकार की अगुआई कर रहे पंडित नेहरु ने इसे सिरे से खारिज कर दिया.

 

उनकी अंत्येष्टि में नहीं पहुंचे प्रधानमंत्री नेहरु

राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद राजेंद्र प्रसाद पटना में जाकर रहने लगे थे. पटना में वो सदाकत आश्रम में रहने लगे. वहां उनकी तबीयत भी खराब रहने लगी. उन्हें दमा हो गया था. दरअसल, एक बार उनसे मिलने जयप्रकाश नारायण पहुंचे थे. राजेंद्र बाबू की दशा देखने के बाद उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर उनके सीलन भरे कमरे को साफ-सुथरा करवाया. उसी कमरे में रहते हुए 28 फरवरी, 1963 को उनकी मौत हो गई. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु ने उनकी अंत्येष्टि में पहुंचने की बजाय जयपुर के किसी कार्यक्रम में पहुंचना अधिक महत्वपूर्ण समझा.

राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल रहे डॉ सम्पूर्णानंद के पीए वाल्मीकि चौधरी ने अपनी किताब में लिखा है कि, जब नेहरु को पता चला कि संपूर्णानंद राजेन्द्र बाबू की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए पटना जाना चाहते हैं तो नेहरु ने संपूर्णानंद से कहा कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो, ऐसा कैसे होगा. इसके बाद डा. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया.

वाल्मीकि चौधरी लिखते हैं कि संपूर्णानंद के मन में हमेशा क्लेश रहा कि वे राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके. इतना ही नहीं, नेहरु ने राजेन्द्र प्रसाद के उतराधिकारी डा. एस. राधाकृष्णन को भी पटना न जाने की सलाह दी थी. किन्तु राधाकृष्णन राजेन्द्र प्रसाद के अंतिम संस्कार में भाग लेने पटना पहुंचे थे.


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