हम हिंदुस्तानी दरअसल चरसी हैं


हम हिंदुस्तानी दरअसल चरसी हैं.
चरस, भांग, गांजा और अफीम भारत में प्रतिबंधित है. मतलब आप वैधानिक रूप से फूंक नहीं सकते. कहीं पब्लिक प्लेस पर. लेकिन इस बात से कहां आप अनजान हैं कि देश में कुछ भी आप कर सकते हैं. कुछ भी का मतलब कुछ भी. दंगा करा सकते हैं, आग लगा सकते हैं, नफरत फैला सकते हैं और चरस बो सकते हैं. हालांकि असली जिंदगी की तरह चरस बोने वाला चरस नहीं काटता उसे सूंघने वालों की लंका लगती है. लंका लगनी भी चाहिए. शातिर लोग आग लगाकर निकल लेते हैं फंसते हैं निठल्ले जिन्हें एक अदद काम की तलाश है.
चरसी हैं हम हिंदुस्तानी
हम हिंदुस्तानी चरसी हैं. चरस बोने की आदत है हमारी. चाहे वह बौद्धिक चरस हो या कुबौद्धिक. जिसका बीज सस्ते में मिल जाए वही बो देते हैं. काटने वालों की कोई कमी नहीं है. देश में रोजगार तो है नहीं, सरकारों ने निठल्लेपन को भी काम बना दिया है. खाली आदमी चरस बोए और काटे न तो क्या करे?

माउथ डायरिया के शिकार हैं हम
डिजिटल इंडिया का प्रकोप ऐसा कस के हुआ है भारत के विशाल जनमानस पर कि लोग डायरिया से मर रहे हैं. वही वाली बीमारी जो भक्त भक्षकों को और भक्त रक्षकों को लगी है. कसम से स्वस्थ लोगों की बहुत किल्लत है देश में. ढूंढने से भी कोई मेडिकली फिट बंदा नहीं मिल रहा है.

अवधुतियाएं हैं हम
इस बात से चकित न हों. जिसे घर द्वार की चिंता न हो, नंग-धड़ंग रहता हो उसे शास्त्रों में कहा गया है अवधूत. घर दुआर की कोई टेंशन होती नहीं है जिसे. बोले तो फुल टाइम निकम्मा. आज के हिसाब से. पुराने और असली वाले अवधूत तो बड़े काम के होते हैं. उन्हें आप मंदिर में सजा सकते हैं. हां तो बता रहा था कि असली जिंदगी में आसपास की दुनिया से मतलब न रखने वाले परम परोपकारी पुरुष लोग अक्सर दुनिया की हर विपदा को अपनी विपदा मानते हैं. मस्त एक स्टेटस पड़ जाता है. हिंदू अतिवादी हो गए हैं, मुस्लिम कहीं चैन की सांस लेने नहीं देने रहे हैं. इन लोगों को यही लगता है. दुर्भाग्य से हर स्वार्थी आदमी दुनिया को परमार्थी बनाना चाहता है. खुद घंटा कोई काम ने करें लेकिन चाहते हैं आधी आबादी पूरी क्रांति ही कर दे.

भौंकने के लिए बस मुंह चाहिए
भौंकने के लिए इंसान को चाहिए…एक अदद मुंह. हमारे यहां भाई साहब इतना निकम्मापन है कि हर कोई एक ताल में भौंक रहा है. फेसबुक पर तो सामूहिक रूप से भौंकने की लोगों ने ठान ली है. हिट चाहिए, लाइक चाहिए…शेयर चाहिए. नरक है भाई साहब. नरक. भक्त अलग भौंक रहे हैं. भक्त भक्षक अलग भौंक रहे हैं. मतलब चिल्ल पों मचा है. कई बार लगता है कि किसी ने सबको एक सुर में गांजा पिला दिया है. सब नशे में हैं भाई साहब. दरअसल हम हिंदुस्तानी चरसी हैं.


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